: गाडरवारा,नगर में निकली भगवान जगन्नाथ रथयात्रा,जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ
Fri, Jun 27, 2025
नगर में निकली भगवान जगन्नाथ रथयात्रा,जगन्नाथ के भात को जगत पसारे हाथ
गाडरवारा। बीते शुक्रवार को नगर में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भक्तिभाव से निकाली गई। यात्रा का शुभारंभ स्थानीय जगदीश मंदिर से हुआ जहाँ भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र एवं बहिन सुभद्रा की विधिवत पूजन अर्चना कर उन्हें रथ पर विराजमान किया गया। रथयात्रा बाजे गाजे के साथ नगर के प्रमुख मार्गो पुरानी गल्लामंडी, झंडा चौक, चौकी मोहल्ला, चाँवड़ी, पानी की टंकी,पलोटनगंज से होती हुई मालगुजार मोहल्ले में जाकर समाप्त हुई। यात्रा में जगह जगह श्रद्धांलुओं ने पूजन अर्चना कर प्रसाद चढ़ाया। यात्रा के दौरान श्रद्धांलुओं में रथ खींचने की होड़ मची रही।रथ यात्रा में नगर के धर्मप्रेमी श्रद्धालुओं की उपस्थिति बड़ी संख्या में रही। सम्पूर्ण यात्रा में मीठे चांवल प्रसादी का वितरण किया गया।
: चातुर्मास: आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति से सामंजस्य का पर्व
Thu, Jun 26, 2025
चातुर्मास: आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति से सामंजस्य का पर्व
( आलेख - सुशील शर्मा)
चातुर्मास, संस्कृत के 'चतुः' (चार) और 'मास' (महीने) शब्दों से मिलकर बना है, जो भारतीय उपमहाद्वीप में एक विशिष्ट चार महीने की अवधि को दर्शाता है। यह वह समय होता है जब प्रकृति अपने चरम पर होती है, धरती वर्षा से तृप्त होती है और वातावरण में एक विशेष ऊर्जा का संचार होता है। हिंदू धर्म में इसे आध्यात्मिक साधना, संयम और आत्मचिंतन का पवित्र काल माना जाता है। आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी एकादशी) से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवोत्थान एकादशी) तक चलने वाले इस चातुर्मास का न केवल धार्मिक बल्कि वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व भी है, जो इसे आज भी प्रासंगिक बनाता है।
चातुर्मास का धार्मिक और पौराणिक महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार महीने के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं। यह अवधि शुभ कार्यों, जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि के लिए वर्जित मानी जाती है, क्योंकि भगवान के शयनकाल में मांगलिक कार्य करना उचित नहीं माना जाता।इस दौरान विशेष रूप से तपस्या, व्रत, पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों पर जोर दिया जाता है। साधु-संत इस अवधि में एक स्थान पर चातुर्मास करते हैं, जिसे 'वर्षावास' या 'चौमासा' भी कहते हैं, और अपने भक्तों को धर्म का ज्ञान देते हैं। यह स्वयं पर नियंत्रण, इंद्रियों को साधने और आध्यात्मिक उन्नति का समय होता है।जैन धर्म में भी चातुर्मास का विशेष महत्व है, जहाँ इसे 'पर्युषण पर्व' के रूप में मनाया जाता है। जैन मुनि और साध्वियाँ इस दौरान विहार करना बंद कर देते हैं और एक स्थान पर रुककर साधना करते हैं, ताकि वर्षाकाल में उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवों को हानि न पहुँचे। यह अहिंसा, आत्मशुद्धि और तपस्या का महापर्व होता है। बौद्ध धर्म में भी बुद्ध के समय से ही 'वर्षावास' की परंपरा रही है, जहाँ भिक्षु वर्षा ऋतु में भ्रमण त्याग कर एक स्थान पर ध्यान और अध्ययन करते हैं।
वैज्ञानिक और पर्यावरणीय प्रासंगिकता
चातुर्मास की अवधारणा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और पर्यावरणीय तर्क भी निहित है:
मौसम और स्वास्थ्य:
चातुर्मास मुख्य रूप से मानसून का समय होता है। इस दौरान वातावरण में नमी बढ़ जाती है, जिससे विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव, बैक्टीरिया और वायरस पनपते हैं। यह अवधि बीमारियों के फैलने के लिए अधिक अनुकूल होती है। इस दौरान भोजन में संयम बरतना, हल्का और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना, और साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखना स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। धार्मिक नियम जैसे प्याज, लहसुन, बैंगन आदि के सेवन से परहेज करना, वास्तव में इस अवधि में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में मदद करता है।
पर्यावरण संरक्षण
: वर्षा ऋतु में पृथ्वी पर नए जीवन का संचार होता है। इस दौरान कई छोटे-छोटे जीव-जंतु, कीट-पतंग और वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं। साधु-संतों द्वारा वर्षाकाल में यात्रा न करने का नियम अप्रत्यक्ष रूप से इन जीवों को कुचलने से बचाने और पर्यावरण को संरक्षित करने का संदेश देता है। यह प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने की भारतीय परंपरा का ही एक हिस्सा है।
शरीर शोधन
:इस अवधि में व्रत और उपवास करने से शरीर का डिटॉक्सिफिकेशन (विषहरण) होता है। यह पाचन तंत्र को आराम देता है और शरीर को अंदर से शुद्ध करता है। यह एक प्रकार की प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति है जो सदियों से चली आ रही है।
सामाजिक और व्यक्तिगत प्रासंगिकता
आज के आधुनिक युग में भी चातुर्मास की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है, बल्कि कई मायनों में और बढ़ गई है:
आत्मचिंतन और आत्म-सुधार
: भागदौड़ भरी जिंदगी में हमें अक्सर रुककर अपने भीतर झाँकने का मौका नहीं मिलता। चातुर्मास आत्मचिंतन और आत्म-सुधार के लिए एक आदर्श समय प्रदान करता है। यह हमें अपनी आदतों, विचारों और व्यवहार पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर देता है।
संयम और अनुशासन
:यह अवधि हमें इंद्रियों पर नियंत्रण रखना सिखाती है। उपवास, सात्विक भोजन और अनावश्यक भोग-विलास से दूर रहना हमें अनुशासित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। यह मानसिक दृढ़ता को बढ़ाता है।
पारिवारिक और सामुदायिक बंधन
:चातुर्मास के दौरान होने वाले धार्मिक आयोजन और व्रत-त्योहार परिवार के सदस्यों और समुदाय को एक साथ लाते हैं। लोग मिलकर पूजा-अर्चना करते हैं, कथाएँ सुनते हैं और एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव बढ़ता है।
प्रकृति से जुड़ाव
: यह हमें प्रकृति के करीब लाता है। वर्षा की बूंदों, हरियाली और वातावरण में ताजगी का अनुभव करने से हम अपने आसपास के पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील बनते हैं।
डिजिटल डिटॉक्स:
आधुनिक जीवन में हम डिजिटल उपकरणों से चौबीसों घंटे घिरे रहते हैं। चातुर्मास में कुछ नियमों का पालन करके हम एक प्रकार का डिजिटल डिटॉक्स कर सकते हैं, जिससे मानसिक शांति और एकाग्रता बढ़ती है।चातुर्मास केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या चार महीनों की अवधि नहीं है। यह भारतीय संस्कृति की गहरी समझ, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरणीय चेतना का प्रतीक है। यह हमें सिखाता है कि कैसे हम प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर, स्वयं को अनुशासित कर और आध्यात्मिकता की ओर बढ़कर एक स्वस्थ और सार्थक जीवन जी सकते हैं। आज के तनावपूर्ण और भौतिकवादी युग में, चातुर्मास हमें अपनी जड़ों से जुड़ने, आत्मिक शांति पाने और जीवन के सही अर्थ को समझने का एक अनमोल अवसर प्रदान करता है। यह आध्यात्मिक शुद्धि और प्रकृति से सामंजस्य का एक जीवंत पर्व है, जिसकी प्रासंगिकता सदियों बाद भी अक्षुण्ण है।✒️सुशील शर्मा✒️
: स्वर्गीय पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी: शैक्षणिक मधुवन के प्राण और प्रेरणा
Tue, Jun 24, 2025
स्वर्गीय पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी: शैक्षणिक मधुवन के प्राण और प्रेरणा
(पुण्य तिथि पर विशेष स्मरण -सुशील शर्मा)आज, जब हम स्वर्गीय पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहे हैं तब हमारी आँखें नम हैं और हृदय कृतज्ञता से भर उठा है। यह केवल एक तिथि का स्मरण नहीं, अपितु एक ऐसे दिव्य व्यक्तित्व के पावन स्मरण का क्षण है, जिन्होंने अपने जीवन को ज्ञान की साधना और आदर्शों की स्थापना में समर्पित कर दिया। पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी, वास्तव में, शैक्षणिक मधुवन के प्राणों के प्राण थे, एक ऐसी ऊर्जा, एक ऐसी चेतना, जिसने न केवल ज्ञान के दीप जलाए, बल्कि अनगिनत जीवन पथों को आलोकित भी किया।मेधा का मणिदीप और प्रतिभा की निर्झरणीआपकी पारदर्शी मेधा का मणि दीप सरकारी विद्यालय के ज्ञान गगन का श्रृंगार थी। यह केवल एक शाब्दिक प्रशंसा नहीं, बल्कि एक अटल सत्य था जिसे हर उस व्यक्ति ने अनुभव किया जिसने आपसे शिक्षा ग्रहण की या आपके सान्निध्य में आया। आपकी बुद्धि की निर्मलता, आपकी सोच की स्पष्टता इतनी अद्वितीय थी कि वह ज्ञान के आकाश में एक दैदीप्यमान नक्षत्र की भाँति चमकती थी। उस समय की सीमित संसाधनों वाली सरकारी पाठशालाओं में भी, आपने अपने ज्ञान के प्रकाश से ऐसा वातावरण सृजित किया, जहाँ सीखना एक आनंदोत्सव बन गया। आपकी उपस्थिति मात्र से ही ज्ञान का एक ऐसा चुंबकीय क्षेत्र निर्मित हो जाता था, जहाँ हर जिज्ञासु मन स्वतः ही खिंचा चला आता था।आपके मानस मंदार से फूटनेवाली प्रतिभा की निर्झरणी की रागिनी शारदा की वीणा की मधुर झंकार थी। आपकी प्रतिभा केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह एक अविरल स्रोत की भाँति थी जो निरंतर प्रवाहित होती रहती थी। आपके विचारों में, आपकी वाणी में, और आपके शिक्षण शैली में ज्ञान, कला और दर्शन का अद्भुत संगम दृष्टिगोचर होता था। जब आप किसी विषय पर व्याख्या करते थे, तो वह केवल तथ्यों का प्रस्तुतिकरण नहीं होता था, बल्कि वह एक संगीतमय प्रवाह होता था, जो श्रोताओं के हृदय में उतर जाता था। यह ऐसा था मानो विद्या की देवी सरस्वती स्वयं अपनी वीणा के तारों को छेड़ रही हों, और उस मधुर झंकार से निकली ज्ञान की स्वर-लहरियाँ प्रत्येक हृदय में प्रवेश कर रही हों। आपके प्रत्येक शब्द में एक लय होती थी, एक प्रवाह होता था, जो कठिन से कठिन विषय को भी सुगम और ग्राह्य बना देता था।आपके ज्ञान के कलधौत कलश से छलछल छलकते रस का छककर जिसने रसपान किया वह ज्ञान का दिनमान और विवेक का वागीश हो गया। "कलधौत" अर्थात् स्वर्ण। आपके ज्ञान का कलश स्वर्ण के समान शुद्ध और बहुमूल्य था, जिससे अमृत तुल्य ज्ञान छलक रहा था। जिसने भी उस ज्ञान रूपी अमृत का भरपेट पान किया, वह जीवन में ज्ञान का दिनमान बन गया अर्थात ज्ञान से इतना परिपूर्ण हो गया कि उसका प्रकाश सूर्य के समान फैलने लगा। और वह विवेक का वागीश हो गया अर्थात अपनी बुद्धिमत्ता और तर्कशक्ति में अद्वितीय वक्ता या विद्वान बन गया। आपने न केवल ज्ञान प्रदान किया, बल्कि उसे आत्मसात करने और जीवन में प्रयोग करने की कला भी सिखाई। आपके शिष्य आज समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं, और यह सब आपकी देन है। आपने उन्हें केवल किताबी ज्ञान नहीं दिया, बल्कि उन्हें सोचने, समझने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता प्रदान की।*समदर्शी विद्वान और पारदर्शी चरित्रवान:*एक स्वप्निल व्यक्तित्वआपके जैसा समदर्शी विद्वान और पारदर्शी चरित्रवान अब सिर्फ स्वप्न है। यह कथन आज के समय की एक कठोर सच्चाई को बयां करता है। समदर्शिता, अर्थात सभी को समान भाव से देखने वाला, बिना किसी भेदभाव के। आपने अपने छात्रों के बीच कभी कोई भेद नहीं किया, चाहे वे किसी भी पृष्ठभूमि से आए हों। आपकी दृष्टि में सभी ज्ञान के प्यासे थे और सभी को समान रूप से ज्ञान रूपी जल प्रदान किया जाना चाहिए था। आपका चरित्र इतना पारदर्शी था कि उसमें कोई छल-कपट, कोई द्वेष या कोई स्वार्थ नहीं था। आप जो थे, वही दिखते थे; आपके मन और वचन में कोई भिन्नता नहीं थी। यह निष्कलंकता आज के जटिल समाज में दुर्लभ हो गई है, और यही कारण है कि आपका व्यक्तित्व अब एक मधुर स्वप्न जैसा प्रतीत होता है, जिसकी कल्पना तो की जा सकती है, पर जिसका साकार होना कठिन है।*कला, विद्या और तप त्याग के भगीरथ*आप कला के कलाधर, विद्या के वारिद और रेणु की मणिमाला में मेरु के मनका गूँथनेवाले कुशल कलावंत थे। आप केवल शिक्षक ही नहीं, एक सच्चे कलाकार भी थे। "कलाधर" अर्थात् कला को धारण करने वाले। आपकी शिक्षण शैली स्वयं एक कला थी, जहाँ आप शब्दों और विचारों को इतनी खूबसूरती से गढ़ते थे कि वे सीधे हृदय में उतर जाते थे। "विद्या के वारिद" अर्थात् विद्या के बादल। आप ज्ञान के ऐसे घने बादल थे जो हर प्यासे पर बरसते थे, और उन्हें तृप्त करते थे। "रेणु की मणिमाला में मेरु के मनका गूँथनेवाले कुशल कलावंत" यह उपमा आपकी अद्भुत क्षमता को दर्शाती है। रेणु अर्थात् धूल, साधारणता। आपने साधारण से साधारण व्यक्तियों (धूल के समान) को भी मणि के समान चमका दिया। आपने उन्हें ज्ञान और संस्कारों की ऐसी माला में पिरोया, जिसका मेरु (सबसे बड़ा और केंद्रीय मनका) स्वयं आप थे। यह दर्शाता है कि आप कितने कुशल शिक्षक और मार्गदर्शक थे, जिन्होंने सामान्य को असाधारण बनाने की क्षमता रखी।आप वस्तुतः आधुनिक युग के भगीरथ थे जिनके तप त्याग के तटों में बंधकर सफलता की तटिनी ने अनेक शुष्क पौधों को भी सींच सींचकर उन्हें पुष्पित एवं पल्लवित कर दिया। पौराणिक कथाओं के भगीरथ ने अपने तप से गंगा को धरती पर उतारा था। ठीक उसी प्रकार, आपने भी अपने अथक तप, अथाह त्याग और अदम्य संकल्प से ज्ञान की ऐसी गंगा बहाई, जिसने अनेक सूखे, निराश और संभावनाहीन जीवन रूपी पौधों को भी सींचकर हरा-भरा कर दिया। आपके शिक्षण से न केवल ज्ञान प्राप्त हुआ, बल्कि जीवन जीने की कला, संघर्षों से जूझने की शक्ति और सफल होने की प्रेरणा भी मिली। आपने अपने छात्रों के भीतर की सुप्त क्षमताओं को जगाया और उन्हें जीवन में सफलता के शिखर पर पहुँचाया।*आदर्शों की मशाल और निश्छल व्यक्तित्व* आप सदा निर्भीक, निर्विवाद, निष्कलंक, निश्छल और निःस्पृह रहे और आपका पासंग गुण भी अगर आज की पीढ़ी में आ जाए तो शायद इस पीढ़ी के लिए इससे ज्यादा सौभाग्यशाली कुछ नहीं होगा। आपकी निर्भीकता ने आपको कभी सत्य बोलने या सही राह दिखाने से नहीं रोका। आप वाद-विवाद से परे रहे, क्योंकि आपका आचरण स्वयं में इतना शुद्ध था कि उस पर कोई उँगली नहीं उठा सकता था। निष्कलंकता और निश्छलता आपके व्यक्तित्व के अभिन्न अंग थे। "निःस्पृह" यानी बिना किसी इच्छा या कामना के। आपने जो भी किया, निस्वार्थ भाव से किया, बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के। यदि आज की पीढ़ी आपके इन गुणों का एक छोटा सा अंश भी धारण कर ले, तो यह उनके लिए और समाज के लिए एक महान उपलब्धि होगी। आपका जीवन स्वयं में एक पाठ्यपुस्तक था, एक जीवंत उदाहरण था कि कैसे एक व्यक्ति सिद्धांतों और मूल्यों पर अटल रह सकता है।स्वर्गीय पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी जी एक ऐसा किरदार, एक ऐसी शख्शियत थे, जीवन का एक ऐसा आधार थे जो अपने कंधों पर उच्च आदर्शों की मशाल जलाये नयी पीढ़ी को मार्गदर्शित करते रहे। आप केवल एक शिक्षक नहीं थे, बल्कि एक प्रकाशस्तंभ थे जिसने अनगिनत युवा मनों को दिशा दी। आपके आदर्शों की मशाल की रोशनी में, न जाने कितने भटके हुए पथिकों ने अपनी राह खोजी और जीवन में सार्थक मुकाम हासिल किया। आपका व्यक्तित्व कठोर दिख सकता था, पर आपका हृदय मक्खन सा कोमल था। यह वह कोमलता थी जो करुणा, स्नेह और अपनेपन से भरी थी। जीवन के पग-पग पर, आपने हमें सही और गलत का बोध कराया, मुश्किलों में धैर्य रखना सिखाया और हमेशा सकारात्मक रहने की प्रेरणा दी। आपका नाम हमारी पहचान की धुरी है, क्योंकि आपने हमें वह आधार दिया जिस पर खड़े होकर हम अपने सपनों को बुन सके।*आध्यात्मिक, भौतिक और सामाजिक ज्ञान का संगम* पूज्य स्वर्गीय पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी जी जिन्होंने जीवन में सभी आंतरिक आध्यात्मिक, भौतिक, व सामाजिक ज्ञान को हमेशा आत्मसात करने में सम्पूर्ण विवेक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का सहारा लिया। आपने केवल शाब्दिक ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि जीवन के गूढ़ रहस्यों को भी समझाया। आपने आध्यात्मिकता को विज्ञान से, और भौतिकता को नैतिकता से जोड़कर देखा। आपकी दृष्टि इतनी व्यापक थी कि आपने जीवन के हर पहलू को समझा और उसे अपनी शिक्षा में समाहित किया। हम धन्य हैं कि हमें आपका सानिध्य मिला, आपकी छत्रछाया में पलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आप सदैव हमारे आदर्श रहेंगे, आपकी शिक्षाएँ हमारे जीवन का पथ प्रदर्शन करती रहेंगी। हे तात, 'प्रेम' आपका नाम था और प्रेम ही आपका धर्म। यह कथन आपके संपूर्ण जीवन का सार है।आपका नाम 'प्रेमनारायण' था और आपने अपने जीवन के हर पल में प्रेम, करुणा और सौहार्द को जिया। आपने सभी को प्रेम से जीता, और प्रेम ही आपका सबसे बड़ा संदेश था। आज ही के दिन हमारे ऊपर से आपका साया उठा था। यह एक ऐसा दिन है जिसे हम कभी भूल नहीं सकते। समय कितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है, मालूम ही नहीं पड़ता, परंतु आपकी स्मृति हमारे हृदय में चिरस्थायी है। आपकी इस पुण्यतिथि पर आपके श्री चरणों में शत-शत नमन।*स्वप्न में भी आपका आशीष* कुशल-क्षेम पूछने स्वप्न में अब भी आते हैं।देकर शुभ आशीष पीठ अब भी सहलाते हैं। ये पंक्तियाँ मात्र कविता नहीं, बल्कि उन अनुभवों का प्रतिबिंब हैं जो आपके शिष्यों और प्रियजनों ने महसूस किए हैं। भले ही आप शारीरिक रूप से हमारे बीच न हों, आपकी उपस्थिति, आपका आशीर्वाद और आपका स्नेह आज भी हमें महसूस होता है। आप स्वप्न में आकर हमारी कुशल-क्षेम पूछते हैं, हमारी पीठ सहलाते हैं और हमें शुभ आशीष देते हैं। यह दर्शाता है कि आपका प्रभाव कितना गहरा और स्थायी है, जो समय और भौतिक सीमाओं से परे है। आपकी आत्मा की पवित्रता और आपका प्रेम हमें आज भी राह दिखाते हैं और सहारा देते हैं।पंडित प्रेमनारायण त्रिपाठी जी, आप अमर हैं, क्योंकि आप अपने ज्ञान, आदर्शों और प्रेम के माध्यम से असंख्य हृदयों में जीवित हैं। आपकी विरासत हमें सदैव प्रेरित करती रहेगी। विनम्र श्रद्धांजलि सहित,सुशील शर्मा