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वर्षा की बूंदें जब धरती पर आती हैं तो सूखी मिट्टी भीगकर नरम हो जाती है,

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वर्षायोग में गुरु की वाणी रूपी वर्षा से संस्कारित होती है आत्मा, मुनि : वर्षा की बूंदें जब धरती पर आती हैं तो सूखी मिट्टी भीगकर नरम हो जाती है,

Aditi News Team

Tue, Aug 18, 2026

वर्षायोग में गुरु की वाणी रूपी वर्षा से संस्कारित होती है आत्मा, मुनि श्री समतासागर महाराज

कुण्डलपुर(म.प्र.)। वर्षा की बूंदें जब धरती पर आती हैं तो सूखी मिट्टी भीगकर नरम हो जाती है। उस माटी को कोई कुशल शिल्पी अपने हाथों से सुंदर आकार दे सकता है। इसी माटी की महासत्ता को पहचानकर हमारे गुरुवर आचार्य श्री ने मृदु माटी को संस्कारित कर मंगल घट का आकार दिया।

अविनाश जैन विद्यावाणी एवं क्षेत्रीय प्रचारमंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने वर्षायोग के अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जिस मिट्टी को हर व्यक्ति अपने पैरों तले रौंदता हुआ चला जाता है, यदि कोई कुशल कुम्हार उसकी क्षमता को पहचान ले तो वही मिट्टी मंगल घट बन जाती है। ठीक इसी प्रकार संसार में पड़ी हमारी आत्मा पर यदि किसी ज्ञानी गुरु की दृष्टि पड़ जाए और उनकी कृपा प्राप्त हो जाए, तो साधना और संस्कार के माध्यम से यही आत्मा सिद्धपद को प्राप्त कर सकती है।

मुनि श्री ने कहा कि वर्षाकाल में बारिश की बूंदें मिट्टी को भीतर-बाहर से भिगो देती हैं। उसी प्रकार वर्षायोग में जब गुरु की वाणी रूपी वर्षा भव्यात्माओं पर होती है तो उनके भीतर श्रद्धा और संस्कार का भाव जागता है। वे भीतर से तर होते हैं और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने के योग्य बनते हैं।

उन्होंने कहा कि आप सभी कुण्डलपुर के बड़े बाबा भगवान आदिनाथ जी के चरणों में इसी भावना के साथ उपस्थित हुए हैं। जिन पवित्र महापुरुषों, धर्मपुरुषों और तीर्थंकरों की पूजा-अर्चना हम करते हैं, उनके गुण हमारे भीतर भी प्रकट हों और हम भी सिद्धत्व के मार्ग पर आगे बढ़ें—यही सच्ची भावना होनी चाहिए।

मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि आप अपनी व्यस्तताओं से समय निकालकर यहां तक आए हैं, यह आपका पुण्ययोग है। लेकिन विचार यह करना है कि यहां से क्या देकर जाएंगे और क्या लेकर जाएंगे? भगवान के चरणों में श्रद्धा, भक्ति और भाव अर्पित करके जा रहे हैं, लेकिन यहां से जीवन के लिए कोई संकल्प लेकर जाना भी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भगवान से प्रार्थना करें—“हे भगवान! आज मेरे पास जो कुछ भी है, वह पुण्य के उदय से मिला है। यह कब तक रहेगा, इसका कोई भरोसा नहीं। मुझे ऐसी सद्बुद्धि प्रदान करना कि मैं अपने द्रव्य का सदुपयोग अच्छे कार्यों में करता रहूं, स्वयं को व्यसन और बुराइयों से बचाऊं, परिवार का ध्यान रखूं, बड़ों की सेवा करूं और सभी का सहयोग करूं।”

मुनि श्री ने कहा कि आमदनी भले ही सीमित हो, लेकिन यदि परिवार व्यसन और बुराइयों से बचा हुआ है तो उसकी संपन्नता धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। दूसरी ओर करोड़ों-अरबों कमाने वाला व्यक्ति यदि व्यसन और बुराइयों में पड़ जाए तो उसे सड़क पर आने में देर नहीं लगती। इसलिए जीवन की वास्तविक संपन्नता धन से अधिक संस्कार और सदाचार में है।

मुनि श्री समतासागर महाराज ने कहा कि जब आप कुण्डलपुर से अपने नगर और घर वापस लौटें तो केवल अभिषेक और पूजन की स्मृति लेकर न जाएं, बल्कि यह संकल्प भी लेकर जाएं कि मेरे जीवन से एक बुराई छूटेगी और मैं एक अच्छाई को अपने जीवन में स्थान दूंगा।

उन्होंने कहा कि अच्छे कार्य की कोई एक परिभाषा नहीं है। जो कार्य केवल अपने स्वार्थ के लिए न होकर स्वयं के साथ-साथ दूसरों के हित में हो, जो किसी की आवश्यकता पूरी करे और समाज के लिए उपयोगी बने, वह अच्छा कार्य है। इसलिए यहां से कोई एक अच्छाई ग्रहण करके जाएं और कोई एक बुराई छोड़कर जाएं।

*राष्ट्रीयता दो दिवसों की नहीं, जीवनभर का संकल्प : मुनि श्री पवित्र सागर महाराज*

इस अवसर पर मुनि श्री पवित्र सागर महाराज ने कहा कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता दिवस पर केवल एक दिन देशभक्ति कर लेना पर्याप्त नहीं है। राष्ट्रीयता को केवल 26 जनवरी और 15 अगस्त तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे जीवनभर का संकल्प बनाना चाहिए। राष्ट्रप्रेम दो दिवसों की भावना नहीं, बल्कि निरंतर राष्ट्रसेवा और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा है।

उन्होंने कहा कि जैन समाज यदि शासन और राष्ट्रनिर्माण में प्रभावी भागीदारी चाहता है तो उसे अपनी पहचान, संख्याबल, एकजुटता और प्रशासनिक प्रतिनिधित्व—इन चारों को मजबूत करना होगा। जैन समाज के युवाओं को IAS, IPS और PSC जैसी प्रशासनिक सेवाओं में आगे आकर ईमानदारी एवं समर्पण के साथ समाज और राष्ट्र की सेवा करनी चाहिए।

मुनि श्री ने कहा कि जनगणना में जैन समाज की वास्तविक संख्या सामने आना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक जैन को अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से दर्ज करानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि “जैन कोई जाति नहीं, बल्कि धर्म है।” समाज में अनेक जातीय एवं क्षेत्रीय पहचानें हो सकती हैं, लेकिन सभी को जोड़ने वाली व्यापक पहचान जैन धर्म की है।

उन्होंने कहा कि यदि जैन समाज शासन में अपनी प्रभावी भागीदारी और प्रतिनिधित्व चाहता है तो उसे अपने संख्याबल को सामने लाना होगा। इसके लिए समाज को अपनी पहचान के प्रति जागरूक होकर एकजुट होना आवश्यक है। प्रशासनिक सेवाओं में अधिकाधिक युवाओं के आने से समाज राष्ट्र की व्यवस्था में सकारात्मक और ईमानदार योगदान दे सकता है।

मुनि श्री पवित्रसागर महाराज ने आह्वान किया कि जैन समाज अपनी पहचान को लेकर सजग बने, अपने संख्याबल को संगठित शक्ति में बदले और शासन-व्यवस्था में अपनी सार्थक भागीदारी सुनिश्चित करे। यही राष्ट्रप्रेम को व्यवहार में उतारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

उपरोक्त जानकारी अविनाश जैन विद्यावाणी एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचार मंत्री जयकुमार जैन जलज ने दी।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

मुनि श्री समतासागर महाराज

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