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: रिश्ते प्रेम से अंकुरित होते है और मुरझा जाते हैं गलतफहमियों से तथा अहंकार से बिखर जाते हैं, इसलिए अपनों का ख्याल रखें,क्योंकि जीवन के साथ में रिश्ते भी अनमोल हैं

Aditi News Team

Thu, Jun 12, 2025
रिश्तों की बगिया: प्रेम से अंकुरित, अहंकार से बिखरती (आलेख - सुशील शर्मा) रिश्ते - ये महज सामाजिक ताने-बाने का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे जीवन की सबसे अनमोल पूंजी हैं। ये वे अदृश्य धागे हैं जो हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं, हमें खुशी देते हैं, सहारा देते हैं और हमें पूरा करते हैं। हर रिश्ते की अपनी एक यात्रा होती है, एक बीज से विशाल वृक्ष बनने तक का सफर। यह सफर प्रेम से शुरू होता है, संवाद से पोषित होता है, संवेदनाओं से जीवंत रहता है, दिल से जिया जाता है, गलतफहमियों की धूप से मुरझा सकता है, और अहंकार की आँधी में बिखर भी सकता है। प्रेम: रिश्तों का आदि बीज "रिश्ते अंकुरित होते हैं प्रेम से!" - यह वाक्य रिश्ते की सबसे मौलिक और महत्वपूर्ण नींव को दर्शाता है। ठीक वैसे ही जैसे एक बीज को अंकुरित होने के लिए उपजाऊ मिट्टी, पानी और सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है, उसी तरह एक रिश्ते को जन्म लेने के लिए प्रेम की आवश्यकता होती है। यह प्रेम सिर्फ रोमांटिक प्रेम नहीं, बल्कि स्नेह, आत्मीयता, सम्मान और विश्वास का मिश्रण है। जब दो लोग एक-दूसरे के प्रति स्नेह और सम्मान का भाव रखते हैं, तो उनके बीच एक अदृश्य ऊर्जा का संचार होता है। यह ऊर्जा उन्हें करीब लाती है, उन्हें एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है। एक माँ और बच्चे का रिश्ता, पति-पत्नी का संबंध, दोस्तों की यारी, भाई-बहन का दुलार - इन सभी की उत्पत्ति प्रेम से ही होती है। यह प्रेम ही वह पहला स्पंदन है जो दो आत्माओं को एक धागे में पिरोता है और एक नए रिश्ते का सूत्रपात करता है। बिना प्रेम के कोई भी रिश्ता सिर्फ एक औपचारिकता या समझौता बनकर रह जाता है, जिसमें कोई गहराई या स्थायित्व नहीं होता। प्रेम ही रिश्ते को साँसें देता है, उसे बढ़ने की ताकत देता है और उसे हर मुश्किल से लड़ने की हिम्मत देता है। यह वह उर्वरक है जो रिश्ते रूपी पौधे को फलने-फूलने के लिए पोषण प्रदान करता है। संवाद: रिश्तों की जीवनदायिनी साँस "जिंदा रहते हैं संवाद से!" - एक बार जब रिश्ता अंकुरित हो जाता है, तो उसे जीवित रखने के लिए निरंतर पोषण की आवश्यकता होती है, और यह पोषण संवाद से मिलता है। संवाद केवल शब्दों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि विचारों, भावनाओं, अपेक्षाओं और चिंताओं को व्यक्त करने का माध्यम है। यह एक दोतरफा प्रक्रिया है जिसमें सुनना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना बोलना। जब रिश्ते में संवाद की कमी होती है, तो गलतफहमियाँ जन्म लेने लगती हैं, दूरियाँ बढ़ने लगती हैं और प्रेम पर संदेह के बादल छाने लगते हैं। स्पष्ट और ईमानदारी से संवाद करने से मन में उठने वाले संदेह दूर होते हैं, अपेक्षाएँ स्पष्ट होती हैं और भावनाएँ साझा की जाती हैं। यह रिश्तों में पारदर्शिता लाता है और विश्वास को मजबूत करता है। पति-पत्नी के बीच खुला संवाद उनके वैवाहिक जीवन को मजबूत बनाता है, बच्चों और माता-पिता के बीच संवाद पीढ़ी के अंतराल को कम करता है, और दोस्तों के बीच संवाद उनकी दोस्ती को गहरा करता है। संवाद सिर्फ सुखद बातों तक सीमित नहीं होता। मुश्किल विषयों पर बात करना, मतभेदों को सुलझाना, और अपनी कमजोरियों को साझा करना भी संवाद का ही हिस्सा है। यह रिश्तों को परिपक्व बनाता है और उन्हें जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। एक रिश्ता बिना संवाद के उसी तरह मुरझा जाता है जैसे बिना पानी के पौधा। यह रिश्तों की जीवनदायिनी साँस है, जिसके बिना वे घुटकर दम तोड़ सकते हैं। संवेदनाएँ: रिश्तों का हृदय स्पंदन "महसूस होते हैं संवेदनाओं से!" - संवाद जहाँ रिश्ते को जीवित रखता है, वहीं संवेदनाएँ उसे वास्तविक और गहरा बनाती हैं। संवेदनाएँ एक-दूसरे की भावनाओं को समझने, महसूस करने और साझा करने की क्षमता हैं। यह सिर्फ मौखिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव है। जब हम किसी अपने की खुशी में खुश होते हैं, उसके दुःख में दुखी होते हैं, उसकी चिंता में चिंतित होते हैं और उसकी सफलता पर गर्व महसूस करते हैं, तो हम संवेदनाओं के माध्यम से रिश्ते को जी रहे होते हैं। संवेदनाएँ सहानुभूति और समानुभूति से आती हैं। किसी के दर्द को अपना दर्द समझना, उसकी खुशी में खुद को शामिल करना – ये संवेदनाएँ ही रिश्तों को एक भावनात्मक गहराई देती हैं। एक बीमार व्यक्ति के लिए अपनों की चिंता, एक हारे हुए व्यक्ति के लिए सहानुभूति भरे शब्द, एक सफल व्यक्ति के लिए सच्ची बधाई - ये सब संवेदनाओं के ही विभिन्न रूप हैं। संवेदनाएँ रिश्तों में गर्माहट लाती हैं, उन्हें मानवीय बनाती हैं और उनमें भावनात्मक सुरक्षा का भाव पैदा करती हैं। जब हम जानते हैं कि कोई है जो हमारी भावनाओं को समझता है और महसूस करता है, तो हम उस रिश्ते में अधिक सुरक्षित और सहज महसूस करते हैं। बिना संवेदनाओं के, रिश्ते यांत्रिक और सतही हो जाते हैं, जहाँ सिर्फ औपचारिकताएँ निभाई जाती हैं, भावनाएँ नहीं। दिल से जीना: रिश्तों की परम अभिव्यक्ति "जिये जाते हैं दिल से!" - प्रेम से अंकुरित, संवाद से जीवित और संवेदनाओं से महसूस होने वाले रिश्ते अंततः दिल से जिए जाते हैं। इसका अर्थ है कि रिश्तों को बोझ या कर्तव्य के रूप में नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से, सच्चे मन से और पूरी लगन से जीना। दिल से जीने का मतलब है रिश्ते में पूरी तरह से शामिल होना, अपनी आत्मा और अपने सच्चे स्वरूप के साथ। इसमें दिखावा नहीं होता, कोई गणना नहीं होती, बस एक स्वाभाविक प्रवाह होता है। जब हम किसी रिश्ते को दिल से जीते हैं, तो हम उसकी खुशी में अपनी खुशी पाते हैं, उसकी भलाई में अपनी भलाई देखते हैं, और उसके लिए निस्वार्थ रूप से कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। यह रिश्तों की वह पराकाष्ठा है जहाँ स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता और केवल प्रेम, विश्वास और समर्पण का राज होता है। एक दोस्त जो बिना किसी अपेक्षा के मदद करता है, एक पति-पत्नी जो हर सुख-दुख में एक-दूसरे का हाथ थामे रहते हैं, एक परिवार जो एक-दूसरे का संबल बनता है - ये सभी दिल से जिए जाने वाले रिश्तों के उदाहरण हैं। ऐसे रिश्ते जीवन को समृद्ध बनाते हैं, उसे अर्थ देते हैं और हमें पूर्णता का अनुभव कराते हैं। दिल से जिए गए रिश्ते ही हमें जीवन की सबसे बड़ी खुशियाँ देते हैं और सबसे गहरे घावों को भरने की क्षमता रखते हैं। गलतफहमियाँ: रिश्तों का मुरझाना "मुरझा जाते हैं गलतफहमियों से!" - जिस तरह एक खूबसूरत फूल अपनी पत्तियों पर जमी धूल या नमी की कमी से मुरझा सकता है, उसी तरह रिश्ते गलतफहमियों की धूल से मुरझा जाते हैं। गलतफहमियाँ तब पैदा होती हैं जब संवाद में कमी होती है, जब हम दूसरों की बातों या इरादों को गलत तरीके से समझते हैं, या जब हम बिना स्पष्टीकरण के धारणाएँ बना लेते हैं। एक छोटी सी गलतफहमी, यदि समय पर दूर न की जाए, तो एक बड़े विवाद का रूप ले सकती है। यह संदेह पैदा करती है, विश्वास को कमजोर करती है और रिश्तों में कड़वाहट घोल देती है। अक्सर लोग गलतफहमी को दूर करने के बजाय मन में दबाए रखते हैं, जिससे वह धीरे-धीरे एक जहरीले पौधे की तरह पनपती है और रिश्ते को भीतर से खोखला कर देती है। एक गलतफहमी के कारण भाई-भाई के बीच दीवार खड़ी हो सकती है, दोस्तों में दरार आ सकती है, या वैवाहिक जीवन में तनाव बढ़ सकता है। रिश्तों को मुरझाने से बचाने के लिए, गलतफहमियों को तुरंत और खुले दिल से दूर करना अत्यंत आवश्यक है। यह संवाद और स्पष्टीकरण के माध्यम से ही संभव है। अहंकार: रिश्तों का बिखराव और बिखर जाते हैं अहंकार से। - यदि गलतफहमियाँ रिश्तों को मुरझाती हैं, तो अहंकार उन्हें पूरी तरह से बिखेर देता है। अहंकार वह जहरीली हवा है जो रिश्तों को जड़ से उखाड़ फेंकती है। यह 'मैं' की भावना है जो हमें दूसरों से ऊपर रखती है, हमें अपनी गलतियों को स्वीकार करने से रोकती है, और हमें माफी मांगने या झुकने नहीं देती। जब अहंकार रिश्ते में प्रवेश करता है, तो लचीलापन खत्म हो जाता है, सहानुभूति मर जाती है और प्रेम का स्थान जिद ले लेती है। अहंकारी व्यक्ति सिर्फ अपनी बात मनवाना चाहता है, दूसरों की भावनाओं की परवाह नहीं करता और अपनी गलतियों को स्वीकार करने में संकोच करता है। यह संवाद को बाधित करता है, संवेदनाओं को मारता है और दिल से रिश्ते को जीने की क्षमता को नष्ट कर देता है। अहंकार के कारण कई मजबूत रिश्ते टूट जाते हैं, परिवार बिखर जाते हैं और जीवन भर की दोस्ती खत्म हो जाती है। अहंकार एक ऐसा विध्वंसक है जो अपने रास्ते में आने वाले हर रिश्ते को राख कर देता है। यह हमें अकेलेपन की ओर धकेलता है और हमें उन लोगों से दूर कर देता है जो हमें सबसे ज्यादा प्यार करते हैं।   रिश्ते एक नाजुक फूल की तरह हैं जिन्हें निरंतर देखभाल और पोषण की आवश्यकता होती है। प्रेम वह बीज है जिससे ये अंकुरित होते हैं, संवाद वह पानी है जो इन्हें जीवित रखता है, संवेदनाएँ वह धूप हैं जो इन्हें महकाती हैं, और दिल से जीना वह माली है जो इनकी देखभाल करता है। लेकिन जरा सी लापरवाही, एक गलतफहमी की धूल, या अहंकार की आँधी इन्हें मुरझाकर बिखेर सकती है। इसलिए, हमें अपने रिश्तों को अनमोल समझना चाहिए। उन्हें प्रेम से सींचना चाहिए, खुले संवाद से पोषित करना चाहिए, संवेदनाओं से महसूस करना चाहिए और दिल से जीना चाहिए। हमें गलतफहमियों को समय रहते दूर करना चाहिए और अपने अहंकार को रिश्तों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। तभी रिश्तों की यह बगिया हमेशा हरी-भरी रहेगी और हमारे जीवन को खुशियों के फूलों से भर देगी। क्या हम सब अपने रिश्तों की इस बगिया को संवारने का प्रण ले सकते हैं?   ✒️सुशील शर्मा✒️

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