: गिजूभाई बधेका: बच्चों के गांधी
गिजूभाई बधेका: बच्चों के गांधी
(आलेख - सुशील शर्मा)
भारतीय शिक्षा के इतिहास में गिजूभाई बधेका का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। उन्हें "बच्चों का गांधी" कहा जाता है, और यह उपाधि उन्होंने बाल शिक्षा के क्षेत्र में किए गए अपने क्रांतिकारी और दूरदर्शी कार्यों से अर्जित की। उनका मानना था कि बच्चों को भय और दंड से मुक्त एक आनंदमय वातावरण में सीखना चाहिए, जो उस समय की प्रचलित कठोर शिक्षण पद्धतियों के बिल्कुल विपरीत था।
गिजूभाई ने 20वीं सदी की शुरुआत में प्रचलित रटंत विद्या और अनुशासन-केंद्रित शिक्षा का पुरजोर विरोध किया। वे समझते थे कि यह प्रणाली बच्चों के स्वाभाविक विकास और रचनात्मकता को कुचल देती है। उनका मानना था कि हर बच्चा अद्वितीय है और उसे अपनी गति से सीखने का अवसर मिलना चाहिए।
गिजूभाई ने मोंटेसरी शिक्षा पद्धति को भारत में लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बच्चों के लिए खेल-खेल में सीखने की अवधारणा को बढ़ावा दिया। उनके विद्यालय, जिसे उन्होंने "बाल मंदिर" कहा, एक ऐसी जगह थी जहाँ बच्चे खुशी से आते थे, खेलते थे और प्रयोग करते हुए ज्ञान प्राप्त करते थे। उन्होंने शिक्षण को नीरस व्याख्यान से हटाकर रोचक गतिविधियों, कहानियों और खेल में बदल दिया।
गिजूभाई केवल बच्चों की शिक्षा के बारे में ही नहीं सोचते थे, बल्कि उन्होंने शिक्षकों की भूमिका को भी नई दिशा दी। उनका मानना था कि शिक्षक सिर्फ ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि बच्चों के मित्र, मार्गदर्शक और सहयोगी होने चाहिए। उन्होंने शिक्षकों को बच्चों के मनोविज्ञान को समझने और उनकी व्यक्तिगत ज़रूरतों के अनुसार शिक्षण विधियों को अनुकूलित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
मातृभाषा में शिक्षा के समर्थक: उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में शिक्षा मिलनी चाहिए, क्योंकि यह सीखने की प्रक्रिया को अधिक सहज और प्रभावी बनाती है। उनका मानना था कि अपनी भाषा में सीखने से बच्चे अपनी संस्कृति और जड़ों से भी जुड़े रहते हैं।
गिजूभाई ने बाल साहित्य और शिक्षाशास्त्र पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें "दिवास्वप्न" (दिन के सपने) और "बालदेवो भव" (बच्चे भगवान का रूप हैं) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उनकी कृतियाँ आज भी शिक्षकों और माता-पिता के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
गिजूभाई बधेका ने भारतीय शिक्षा को एक नई दिशा दी। उन्होंने बच्चों को शिक्षा के केंद्र में रखा और दिखाया कि कैसे सीखने को एक आनंदमय और रचनात्मक अनुभव बनाया जा सकता है। उनका दर्शन आज भी प्रासंगिक है और आधुनिक शिक्षा प्रणालियों में समावेशी और बाल-केंद्रित दृष्टिकोणों को अपनाने के लिए प्रेरित करता है। वे वास्तव में भारतीय शिक्षा के एक सच्चे पथ प्रदर्शक थे।
आज उनकी पुण्यतिथि है विनम्र श्रद्धा सुमन अर्पित हैं।
✒️सुशील शर्मा✒️
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