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दूषण नहीं, भूषण बनें; बुरा मत सोचो, अच्छे विचार ही जीवन के वास्तविक आभूषण हैं : निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज

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मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने धर्मसभा में कहा कि : दूषण नहीं, भूषण बनें; बुरा मत सोचो, अच्छे विचार ही जीवन के वास्तविक आभूषण हैं : निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज

Aditi News Team

Thu, Nov 5, 2026

दूषण नहीं, भूषण बनें; बुरा मत सोचो, अच्छे विचार ही जीवन के वास्तविक आभूषण हैं : निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर महाराज

कुण्डलपुर। सिद्धक्षेत्र कुण्डलपुर में निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि चातुर्मास में साधक की बाहरी यात्रा भले ही रुक जाती है, लेकिन उसकी अंतरयात्रा निरंतर जारी रहती है। बाहर की यात्रा में शरीर चलता है, जबकि आध्यात्मिक यात्रा में आत्मा के निकट पहुंचने का पुरुषार्थ किया जाता है। अपने विशुद्ध भावों के माध्यम से आत्मा की ओर बढ़ना ही वास्तविक आध्यात्मिक यात्रा है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्रीय प्रचार मंत्री जय कुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने कहा कि शरीर को स्वच्छ रखने के साथ मन को स्वच्छ रखना भी अत्यंत आवश्यक है। शरीर की शुद्धि चरणानुयोग में महत्वपूर्ण है, जबकि परिणामों की शुद्धि करणानुयोग में महत्व रखती है। वास्तविक अंतरयात्रा परिणामों की निर्मलता से ही संभव होती है। मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में ऐसे विचारों को स्थान देना चाहिए, जो स्वयं के साथ दूसरों के जीवन को भी सुंदर बनाएं। हमारे विचार ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। यदि मन में बुरे विचार, ईर्ष्या, द्वेष और वैमनस्य के भाव रहेंगे तो हमारा व्यक्तित्व दूषण बन जाएगा, लेकिन यदि मन में प्रेम, करुणा, सद्भावना और मैत्री के भाव होंगे तो वही जीवन का भूषण बनेंगे। इसलिए हमें दूषण नहीं, भूषण बनना है। उन्होंने कहा कि किसी के प्रति बुरा सोचने से सबसे पहले हमारा अपना मन दूषित होता है। दूसरों के प्रति दुर्भावना रखने वाला व्यक्ति स्वयं अशांत रहता है। जिस प्रकार शरीर को सुंदर बनाने के लिए बाहरी आभूषण धारण किए जाते हैं, उसी प्रकार जीवन को सुंदर बनाने के लिए अच्छे विचारों और निर्मल भावों को धारण करना चाहिए। अच्छे विचार ही मनुष्य के वास्तविक आभूषण हैं, जो उसके व्यक्तित्व को गरिमा प्रदान करते हैं। मुनि श्री ने कहा कि जीवन में परिस्थितियां कैसी भी हों, अपने विचारों की पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है। व्यक्ति का मूल्यांकन उसके धन, पद और बाहरी सुंदरता से नहीं, बल्कि उसके विचारों, व्यवहार और परिणामों की निर्मलता से होता है। हमें ऐसा कोई विचार नहीं करना चाहिए, जिससे किसी के प्रति कटुता या दुर्भावना उत्पन्न हो। दूसरों के दोष देखने के बजाय अपने दोषों को पहचानकर उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि चातुर्मास केवल एक स्थान पर ठहरने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर झांकने, आत्मचिंतन करने और जीवन को संस्कारित बनाने का अवसर है। बाहरी गतिविधियों से विराम लेकर साधक अपनी आत्मा की शुद्धि के लिए पुरुषार्थ करता है। यदि इस अवधि में हम अपने विचारों और भावनाओं को निर्मल बनाने का संकल्प ले लें तो यही हमारी सच्ची धर्मसाधना होगी। कुण्डलपुर में 9 नवंबर को भगवान महावीर निर्वाण महोत्सव पर निर्वाण लाडू समर्पित किया जाएगा। 12 से 16 नवंबर 2026 तक प्रतिमा व्रत विज्ञान एवं समाधि साधना शिविर का आयोजन किया गया है। अष्टान्हिका महापर्व में 17 से 24 नवंबर 2026 तक श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान का आयोजन होगा। कुण्डलपुर क्षेत्र कमेटी ने श्रद्धालु भक्तों से कुण्डलपुर पधारकर धर्मार्जन करने का अनुरोध किया है।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

मुनि श्री समतासागर जी महाराज

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