Thursday 10th of September 2026

ब्रेकिंग

मनुष्य का जीवन बचपन, यौवन, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से गुजरता है"

CISF Unit NTPC गाडरवारा द्वारा पर्यावरण संरक्षण एवं हरित क्षेत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से NTPC प्लांट के CHP एरिया

राष्ट्रीय श्रमजीवी पत्रकार परिषद के महाधिवेशन में पत्रकार हितों पर मंथन, पदाधिकारियों ने ली शपथ

24 घंटे में छात्रा को मिली मार्कशीट और टीसी अब पढ़ सकेगी गरीब की बेटी

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सागर जिले में अवैध जहरीली शराब से हुई लोगों की मृत्यु पर शोक संवेदना व्यक्त की

निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी ने बताया कि : मनुष्य का जीवन बचपन, यौवन, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से गुजरता है"

Aditi News Team

Thu, Sep 10, 2026

"मनुष्य का जीवन बचपन, यौवन, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से गुजरता है":- निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी

कुण्डलपुर।जीवन की कहानी सोने के लिए नहीं,जागने के लिए सुनें"जीवन" एक कहानी है,और इस कहानी को ध्यान से सुनने की आवश्यकता है,संसार की कहानियां जहां मनुष्य को सुला सकती हैं, वहीं जिनवाणी और ज्ञानी गुरु की वाणी मोह की नींद से जगाकर आत्मचेतना की ओर ले जाती है" हम सभी का जीवन भी एक कहानी है, उपरोक्त उदगार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने‘What is Life?’ श्रृंखला में ‘Life is a Story’ विषय पर कहा। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं क्षेत्र प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने कहा कि कहानी केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कार और जीवन-दृष्टि देने का प्रभावी माध्यम है। बचपन में दादी-नानी की कहानियों से बच्चों को संस्कार मिलते हैं,वंही जिनवाणी की कथा मनुष्य को जगाने का कार्य करती है। जीवन की सच्ची गाथा उसी से सुननी चाहिए, जिसने उस मार्ग को स्वयं जिया हो।अपने बाल्यकाल के संस्मरण सुनाते हुए मुनि श्री ने कहा कि उन्होंने भी अपनी मां से जिनवाणी और धर्म से जुड़ी कथाएं सुनीं।मां चित्रों के माध्यम से धार्मिक प्रसंग समझाती थीं, जबकि पिता पद्मपुराण की वाचना करते थे। राम-रावण की कथा सहित इन प्रसंगों को सुनते-सुनते कब धर्म के संस्कार जीवन का हिस्सा बन गए यह पता ही नहीं चला? उन्होंने कहा कि प्रत्येक कहानी में पात्र, घटनाक्रम, संघर्ष और निष्कर्ष होता है। *मनुष्य का जीवन भी बचपन, यौवन, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था से गुजरता है।*

बचपन संस्कारों की नींव रखता है,यौवन इच्छाओं और कर्तव्यों के संघर्ष से गुजरता है,प्रौढ़ावस्था में अनुभव विवेक में बदलता है और वृद्धावस्था मनुष्य को आत्मचिंतन तथा शांति की ओर ले जाने का अवसर देता है।उन्होंने नदी में आई बाढ़ की कथा के माध्यम से जीवन की दिशा समझाई। जलप्रपात की ओर तेजी से बढ़ती नाव में एक व्यक्ति भोजन-सामग्री बचाने लगा, दूसरा सोने-चांदी के आभूषण समेटने लगा,तीसरा दूसरों को दोष देता रहा,जबकि चौथे ने पतवार संभालकर नाव को किनारे की ओर मोड़ दिया। मुनि श्री ने कहा कि संसार में मनुष्य भी धन,सुख-सुविधाओं और परस्पर दोषारोपण में उलझकर यह भूल जाता है कि जीवन की नाव मृत्यु की ओर बढ़ रही है।धर्म और सही पुरुषार्थ ही उसे मोक्ष के किनारे तक पहुंचा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि यही संस्कार आगे चलकर जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं।

मुनि श्री ने पूर्व आचार्यों को स्मरण करते हुये कहा कि

आचार्य विद्यासागर जी महाराज जैसे महापुरुषों के जीवन में भी संस्कारों की शक्ति स्पष्ट दिखाई देती थी तीर्थंकर आदिनाथ भगवान से लेकर भगवान महावीर स्वामी तक महापुरुषों की जीवनगाथाएं वास्तव में श्रवण औरअनुकरण योग्य हैं।उनके त्याग,तप, संयम और साधना को समझकर जीवन में उतारने पर हमारा अपना जीवन भी दूसरों के लिए प्रेरणा बन सकता है।

गुरुवर आचार्य विद्यासागर जी महाराज के जीवन को आदर्श बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि उनका जीवन त्याग, तपस्या और संयम की ऐसी अमर कथा है,जिसे सुनना ही नहीं, जीना भी चाहिए। उन्होंने कहा

“त्याग-तपस्या, संयम-तप में बीती भरी जवानी है,

विद्याधर से विद्यासागर तक की अमर कहानी है।” जंहा संसार की कहानी धन,पद और प्रतिष्ठा पर समाप्त हो जाती है, लेकिन त्याग, संयम, तप और आत्मजागरण से लिखी गई जीवन-कथा युगों तक समाज को दिशा देती रहती है।

Tags :

जरूरी खबरें