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: अंतिम क्षणों की चुप्पियाँ

Aditi News Team

Fri, Jun 20, 2025
अंतिम क्षणों की चुप्पियाँ (अहमदाबाद विमान हादसे के समय यात्रियों और पायलट की मनःस्थिति पर एक कविता - सुशील शर्मा)   एक सामान्य उड़ान थी वह जैसे हर बार होती है, घोषणाओं की आवाज़, बेल्ट बाँधने की हिदायत, कुछ झपकती आँखें, कुछ चाय मंगाते यात्री, और कुछ खिड़की के पार बादलों की बनावट में अपना भविष्य ढूँढते।   फिर — हवा ने करवट बदली, विमान काँपा — थोड़ा नहीं, बहुत। सहसा लगने लगा कि यह कंपन, इस बार सिर्फ मौसम का नहीं था।   कोई सोच भी न सका कि कुछ ही क्षणों में यह आकाश मुक्ति और मृत्यु दोनों का द्वार बन जाएगा।   विमान काँपा पहले हल्के से, जैसे कोई थरथराती सिहरन, फिर तेज़… जैसे नियति ने अपने पंख खोल दिए हों।   पायलट की उँगलियाँ कंपकंपाईं वो प्रशिक्षित था संयमित, अनुशासित, लेकिन उस क्षण उसने भी शायद पहली बार अपनी माँ को याद किया हो।   उसे मालूम था इंजन का उत्तर नहीं आ रहा, और ऊँचाई गिर रही है लगातार।   “हम सब ठीक रहेंगे” वह बोला स्पीकर पर, पर भीतर ही भीतर वह जानता था कि वह खुद ठीक नहीं है।   और तब वह शांति नहीं थी वह एक ठहरा हुआ आतंक था जहाँ शब्द थम गए और आँखें बोलने लगीं।   एक पिता अपनी बेटी की उँगली थामे काँपते होंठों से मुस्कुरा रहा था “डर मत…कुछ नहीं होगा।” उसके भीतर टूट रही थी हर उम्मीद।   एक नवविवाहिता अपनी माँ को कॉल करने की कोशिश कर रही थी, पर नेटवर्क अब ईश्वर के क्षेत्र में था।   एक बुज़ुर्ग गंगा जल की छोटी शीशी अपने सीने से लगा बुदबुदा रहे थे “हरि ॐ…हरि ॐ…”   कोई नहीं चीखा क्योंकि अब चिल्लाने से कुछ बदलने वाला नहीं था।   हर यात्री अचानक मौन हो गया, जैसे सबने एक-दूसरे की आँखों में अलविदा कह दिया हो।   बच्चे न कुछ समझ पाए न समझाने की ज़रूरत रही बस उन्होंने अपनी माँ की गोद में सिर छिपा लिया जैसे गर्भ में लौट जाना चाहते हों।   पायलट ने आखिरी बार नियंत्रण संभालने की कोशिश की वह जानता था अब कोई चमत्कार नहीं होगा फिर भी वह अंतिम साँस तक कर्म करता रहा।   और फिर एक झटका, एक चिरंतन सन्नाटा। न कोई चीख… न कोई शोर… बस एक आवाज़… जो बहुत दूर तक गूंजती रही…     वो अंतिम क्षण न रुलाई थी, न प्रार्थना, बस एक गहरा मौन था जो उड़ान से उतरकर संसार की स्मृति बन गया।   धरती से टकराते समय वो सब अब आकाश से विलीन हो रहे थे, कुछ धुएँ में, कुछ ख़ामोशी में, कुछ हमारी आँखों की कोरों में।     वे सब चले गए पर उनकी वह अंतिम घड़ी आज भी साँसों में सिसकती है।   यह श्रद्धांजलि-कविता केवल दुर्घटना का ब्योरा नहीं, उन अनकहे अलविदाओं की मौन स्मृति है जो कभी वापस नहीं आएँगी पर हर उड़ान से पहले, हमारे भीतर एक प्रार्थना बनकर उड़ती रहेंगी।   सुशील शर्मा

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