पतंग और डोर के उदाहरण से समझाया श्रद्धा का महत्व : अहिंसक जीवन अपनाने की प्रेरण एवं भगवान से भाव जुड़े रहें, गुरु के मार्गदर्शन में जीवन सुरक्षित रहेगा, मुनि समतासागर जी
Aditi News Team
Sat, Oct 17, 2026
भगवान से भाव जुड़े रहें, गुरु के मार्गदर्शन में जीवन सुरक्षित रहेगा : मुनि श्री समतासागर जी
पतंग और डोर के उदाहरण से समझाया श्रद्धा का महत्व, अहिंसक जीवन अपनाने की प्रेरणा
कुण्डलपुर। भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति के भाव व्यक्ति को उनसे जोड़े रखते हैं। जिस प्रकार पतंग की डोर उड़ाने वाले के हाथ में रहती है, तो वह निश्चिंत होकर पतंग उड़ाता है, उसी प्रकार जीवन की डोर देव, शास्त्र और गुरु से जुड़ी रहे तो व्यक्ति को सही दिशा मिलती है। भगवान भले ही दूर हों, लेकिन उनके प्रति आस्था बनी रहे तो जीवन में आनंद और आत्मविश्वास बना रहता है। यह विचार निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कुण्डलपुर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने जिनेन्द्र भगवान के ज्ञान की विशेषता समझाते हुए कहा कि सर्वज्ञ भगवान समस्त लोक-अलोक के पदार्थों को जानते हैं, फिर भी किसी पदार्थ से प्रभावित नहीं होते। उनका ज्ञान निर्मल और राग-द्वेष से रहित होता है। संसारी जीवों का ज्ञान पदार्थों से जुड़ता है, जिससे परिचित-अपरिचित और अपने-पराए का भेद उत्पन्न होता है। यही भेद आगे चलकर राग-द्वेष और कर्मबंध का कारण बनता है।
मुनि श्री ने कहा कि अरहंत भगवान सबके ज्ञाता-दृष्टा होते हुए भी निजानंद में लीन रहते हैं। वे पदार्थों को जानते हैं, लेकिन उनमें आसक्ति नहीं रखते। व्यवहार नय से भगवान समस्त पदार्थों के ज्ञाता हैं, जबकि निश्चय नय से वे अपनी आत्मा के ही ज्ञाता-दृष्टा हैं। उन्होंने मोहनीय कर्म को आत्मा का सबसे बड़ा शत्रु बताते हुए कहा कि यही कर्म जीव को राग-द्वेष में उलझाकर संसार में भटकाता है। मोहनीय कर्म का क्षय होने पर अरहंत अवस्था प्राप्त होती है, जिसमें आत्मा हर्ष-विषाद और राग-द्वेष से परे हो जाती है।
भगवान का स्मरण जीवन को देता है सही दिशा
मुनि श्री ने कहा कि भगवान भले ही भक्त को याद नहीं करते, लेकिन भक्त के लिए भगवान का स्मरण आवश्यक है। मन को किसी न किसी विषय में लगना ही है। यदि मन धर्म और भगवान के चिंतन में नहीं लगेगा, तो वह संसार के धन, व्यापार और अन्य विषयों में उलझ जाएगा। इसलिए भगवान के प्रति श्रद्धा, भक्ति और आस्था के भाव निरंतर बनाए रखना चाहिए। भगवान के प्रति भावों का संबंध बना रहे तो दूरी भी भक्ति के आनंद को कम नहीं कर सकती।
पतंग और डोर का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि शिष्य पतंग के समान हैं और गुरु उनके जीवन की डोर संभालने वाले हैं। जीवन को देव, शास्त्र और गुरु से जोड़कर रखना चाहिए, ताकि गुरु का मार्गदर्शन मिलता रहे और जीवन सही दिशा में आगे बढ़े। उन्होंने पतंग उड़ाने के दौरान चाइनीज मांझे का उपयोग नहीं करने की सलाह देते हुए कहा कि इससे पक्षियों और मनुष्यों के जीवन को गंभीर खतरा हो सकता है। मनोरंजन के साथ दूसरों की सुरक्षा का ध्यान रखना भी आवश्यक है। जीवन का संदेश है—खुद जियो और दूसरों को भी जीने दो। अपनी पतंग उड़ाने के साथ दूसरों की पतंग को नुकसान पहुंचाने का भाव नहीं होना चाहिए।
कई क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालु
धर्मसभा में श्रद्धालुओं से संवाद करते हुए मुनि श्री ने बताया कि विदिशा, राणापुर, बेंगलुरु, घाटोल और खरगोन सहित देश के अनेक स्थानों से श्रद्धालु कुण्डलपुर पहुंचे हैं। उन्होंने कहा कि वे स्वयं भी यहां के निवासी नहीं हैं। गर्मी के दिनों में सतना में रहने के बाद वे कुण्डलपुर आए हैं और बड़े बाबा के चरणों में चातुर्मास कर रहे हैं। इससे उन्होंने समझाया कि श्रद्धा और भक्ति व्यक्ति को दूर-दूर से तीर्थों तक खींच लाती है।
प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने श्रद्धालुओं को भगवान के प्रति आस्था बनाए रखने, गुरु के मार्गदर्शन में चलने और सभी जीवों के प्रति करुणा रखने की प्रेरणा दी। कुण्डलपुर में 24 -25 अक्टूबर को मुनि ससंघ सानिध्य में गुरु परंपरा समर्पण समारोह आयोजित है। इस अवसर पर निबंध प्रतियोगिता एवं झांकी प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है।
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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
मुनि श्री समतासागर जी, कुंडलपुर