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वास्तविकता से लड़ना छोड़ें, : परिस्थितियों की लहरों पर तैरना सीखें, निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी

Aditi News Team

Wed, Sep 2, 2026

वास्तविकता से लड़ना छोड़ें,परिस्थितियों की लहरों पर तैरना सीखें, निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी

कुण्डलपुर(म.प्र.)।जीवन में शांति के लिए प्रतिरोध का अंत, नियंत्रण का दायरा पहचानना, वर्तमान में जीना और ऊर्जा को सही दिशा देना जरूरी

निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने जीवन की वास्तविकताओं का दर्शन कराते हुए कहा कि मनुष्य यदि वास्तव में सहज, शांत और संतुलित जीवन जीना चाहता है तो उसे सबसे पहले वास्तविकता को स्वीकार करना सीखना होगा। जो जैसा है, उसे वैसा ही मान लेना ही स्वीकृति है। स्वीकृति का अर्थ हार मान लेना, परिस्थितियों को पसंद कर लेना या उनमें रम जाना नहीं है, बल्कि वास्तविकता से संघर्ष छोड़कर उसका साहस और समझदारी के साथ सामना करना है। जीवन में शांति की शुरुआत वहीं से होती है, जहां प्रतिरोध समाप्त होता है।

मुनि श्री ने कहा कि जब हम किसी परिस्थिति को स्वीकार नहीं करते तो हमारे भीतर मानसिक युद्ध शुरू हो जाता है। मन बार-बार पूछता है—“ऐसा मेरे साथ ही क्यों हुआ?”, “मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?” यही प्रश्न भीतर प्रतिरोध पैदा करते हैं और यही प्रतिरोध धीरे-धीरे तनाव, दुख और अशांति का कारण बन जाता है। जो घट चुका है, उससे लगातार लड़ते रहने से वह बदलता नहीं है, लेकिन हमारी मानसिक शांति अवश्य प्रभावित होती है।

उन्होंने कहा कि कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति अक्सर स्वयं को पीड़ित बताकर जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करता है। “मैं तो बेकसूर हूं”, “मैं तो बहुत पीड़ित हूं”, “मैं तो कुछ कर ही नहीं पा रहा हूं”—इस तरह के भाव परिस्थिति का सामना करने के बजाय उससे बचने के उपाय बन जाते हैं। आज की भाषा में इसे ‘विक्टिम कार्ड’ खेलना कहा जा सकता है। व्यक्ति को इस मानसिकता से बाहर निकलना होगा। बहाने बनाने के बजाय परिस्थितियों की वास्तविकता को समझकर उनका सामना करना होगा।

मुनि श्री ने जीवन को समझने के लिए चार महत्वपूर्ण सूत्र बताए। उन्होंने कहा कि पहला सूत्र है—प्रतिरोध का अंत। जो परिस्थिति सामने आ गई है, उससे निरंतर लड़ना समाधान नहीं है। स्वीकार करने का अर्थ निष्क्रिय होना नहीं, बल्कि वास्तविकता को पहचानकर उचित कदम उठाना है। प्रतिरोध समाप्त होते ही मन के भीतर समाधान खोजने की क्षमता विकसित होने लगती है।

दूसरा सूत्र है—अपने नियंत्रण का दायरा पहचानना। उन्होंने कहा कि जीवन में कुछ चीजें हमारे नियंत्रण में हैं और कुछ हमारे नियंत्रण से पूरी तरह बाहर। दूसरों का व्यवहार, किसी की सोच, अतीत की गलतियां या अचानक घटित हुई कोई दुर्घटना हमारे नियंत्रण में नहीं है। फिर ऐसी चीजों को बदलने के लिए लगातार क्रोध, चिंता और संघर्ष करने से क्या मिलेगा? इससे परिस्थिति नहीं बदलेगी, केवल हमारी ऊर्जा और शांति नष्ट होगी।

हमारे नियंत्रण में क्या है? अपनी सोच, अपनी प्रतिक्रिया, अपने निर्णय, अपनी संगति और स्वयं को बदलने की शक्ति। मुनि श्री ने कहा कि हम अक्सर दूसरे व्यक्ति को बदलने में अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं। वह बदले तो ठीक, लेकिन यदि वह नहीं बदलता तो हम कब तक उससे उलझते रहेंगे? इसलिए जीवन का सरल सिद्धांत है—व्यक्ति को बदलने की कोशिश करने से बेहतर है, अपना चुनाव बदल लेना। अपनी प्रतिक्रिया बदलना हमारे हाथ में है और यही वास्तविक स्वतंत्रता है।

तीसरा सूत्र है—जीवन का स्वाद केवल वर्तमान में है। मुनि श्री ने कहा कि अतीत को हम बदल नहीं सकते और भविष्य को अभी जी नहीं सकते। जीवन केवल वर्तमान में घटित होता है, इसलिए उसका आनंद भी वर्तमान में ही लिया जा सकता है। मनुष्य अक्सर आज को छोड़कर कल की प्रतीक्षा करता रहता है—“जब कॉलेज मिलेगा तब खुश रहूंगा, जब नौकरी मिलेगी तब खुश रहूंगा, जब अच्छा पैकेज मिलेगा तब जीवन अच्छा लगेगा।” लेकिन इच्छाओं की यह सूची कभी समाप्त नहीं होती।

उन्होंने कहा कि ख्वाहिशों के पीछे भागने वाले व्यक्ति के पास अक्सर एक लंबी ‘बकेट लिस्ट’ होती है। स्काई डाइविंग, स्कूबा डाइविंग, बंजी जंपिंग जैसी अनेक इच्छाएं पूरी करने की दौड़ लगी रहती है। इच्छाएं रखना गलत नहीं है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम जीवन जी रहे हैं या केवल जीवन को भविष्य की इच्छाओं के हवाले कर रहे हैं? जीवन की वास्तविकता उपलब्धियों की लंबी सूची में नहीं, बल्कि वर्तमान क्षण को सार्थक ढंग से जीने में है।

चौथा सूत्र है—अपनी ऊर्जा को सही दिशा देना। उन्होंने कहा कि हमारी मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा अतीत के पछतावे और भविष्य की चिंता में खर्च हो जाता है। अतीत में बार-बार जाकर हम सोचते हैं—“काश ऐसा नहीं किया होता”, जबकि भविष्य को लेकर मन आशंकाओं से घिरा रहता है। इस प्रकार हमारी ऊर्जा उस जगह खर्च होती रहती है जहां हमारा कोई नियंत्रण नहीं है।

मुनि श्री ने कहा कि अपनी ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ना ही ‘एनर्जी रिडायरेक्शन’ है। जो हमारे हाथ में है, उस पर ध्यान दें और जो हमारे नियंत्रण में नहीं है, उसे लेकर अपनी ऊर्जा नष्ट न करें। वर्तमान में अपनी सोच, व्यवहार और कर्म को बेहतर बनाने में लगाई गई ऊर्जा ही जीवन को सार्थक बनाती है।

मुनि श्री ने जीवन की परिस्थितियों को समझाने के लिए ‘सर्फिंग थ्योरी’ का उदाहरण देते हुए कहा कि समुद्र में उठने वाली लहरों से लड़ना नहीं, बल्कि उन पर तैरना सीखना चाहिए। लहरों से लड़ेंगे तो डूबने का खतरा है, लेकिन लहरों पर तैरना सीख जाएंगे तो वही लहर हमें किनारे तक पहुंचा सकती है। जीवन में आने वाली परिस्थितियां भी समुद्र की लहरों जैसी हैं। वे हमारे सामने आती हैं; उनसे संघर्ष करते रहने के बजाय हमें उनके साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़ना सीखना चाहिए।

मुनि श्री ने कहा कि जैन दर्शन जीवन की वास्तविकता को समझने के लिए अनित्यता के बोध पर भी विशेष बल देता है। बारह भावनाओं में प्रथम अनित्य भावना है। संसार में कोई भी पर्याय स्थायी नहीं है। जो आ रहा है, वह जा रहा है और जो जा रहा है, उसके पीछे भी एक कारण है। जैन दर्शन में आने को उत्पाद, जाने को व्यय और अस्तित्व की निरंतरता को ध्रौव्य के रूप में समझाया गया है। पर्याय बदलती रहती है, लेकिन द्रव्य अपने अस्तित्व में बना रहता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में सुख आया है तो वह भी स्थायी नहीं है और दुख आया है तो वह भी हमेशा रहने वाला नहीं है। न सुख टिकने वाला है, न दुख टिकने वाला है। अनित्यता का यह बोध व्यक्ति को परिस्थितियों में संतुलित रहना सिखाता है। सुख में आसक्ति और दुख में निराशा दोनों से बचने की दृष्टि इसी समझ से विकसित होती है।

मुनि श्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे स्वयं से यह प्रश्न अवश्य पूछें—“क्या मैं सचमुच जीवन जी रहा हूं या केवल अपनी ख्वाहिशों के पीछे भाग रहा हूं?” जीवन को इच्छाओं की अंतहीन दौड़ बनाने के बजाय वर्तमान की वास्तविकता को पहचानकर जीना ही सार्थक जीवन है।

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं कुण्डलपुर क्षेत्र प्रचार मंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री समतासागर महाराज के प्रवचनों में जीवन की वास्तविकता, आत्मचिंतन और सहज जीवन जीने की दृष्टि पर निरंतर मार्गदर्शन दिया जा रहा है। उन्होंने श्रद्धालुओं से मुनि श्री के प्रवचनों का लाभ लेकर जीवन में प्रतिरोध छोड़ने, वर्तमान को स्वीकार करने तथा अपनी ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में लगाने का आह्वान किया।

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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी कुंडलपुर

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