परिवार की परंपरा कमजोर हुई तो : धर्म की परंपरा भी प्रभावित होगी : मुनि श्री समतासागर जी
Aditi News Team
Thu, Oct 8, 2026
"परिवार की परंपरा कमजोर हुई तो धर्म की परंपरा भी प्रभावित होगी : मुनि श्री समतासागर जी
कुण्डलपुर(म.प्र.)। मनुष्य पर्याय के रूप में मिला जीवन पिछले पुण्य का परिणाम है, लेकिन अब इस जीवन में हम ऐसा क्या कर रहे हैं, जिससे आगे का जीवन भी सार्थक हो, इस पर विचार करना जरूरी है। आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद युवा, परिवार और जिम्मेदारियों से स्वतंत्र रहने की मानसिकता बना रहा है। यह सोच व्यक्ति के साथ समाज और धर्म की परंपरा के लिए भी घातक है। आर्थिक आत्मनिर्भरता अच्छी बात है, लेकिन माता-पिता के दायित्वों को स्वीकार करना और धर्म परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए परिवार को आगे बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। यह बात निर्यापक श्रमण मुनि श्री समता सागर जी महाराज ने कुण्डलपुर में प्रवचन के दौरान कही। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन जलज ने बताया कि मुनिश्री ने अपने प्रवचन में परिवार, संस्कार, धर्म परंपरा और जैन समाज की पहचान को लेकर युवाओं को जागरूक किया।
मुनि श्री ने कहा कि आज सिंगल, एकल और स्वतंत्र रहने की मानसिकता बढ़ रही है। व्यक्ति जब आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो जाता है तो उसे लगता है कि अब परिवार और जिम्मेदारियों की जरूरत नहीं है। जबकि साथ रहने वाला व्यक्ति किसी न किसी रूप में मर्यादाओं और व्यवस्थाओं से जुड़ा रहता है। वह मन से बंधा हो, परिस्थिति से बंधा हो या जिम्मेदारी से, लेकिन परिवार के साथ रहने पर जीवन एक व्यवस्था में चलता है। स्वतंत्रता के नाम पर यदि व्यक्ति सभी जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहता है तो धीरे-धीरे स्वच्छंदता बढ़ सकती है। इसलिए आज अपनी सोच को बदलने और परिवार की भूमिका को समझने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि यदि धर्म की परंपरा को आगे बढ़ाना है तो पारिवारिक व्यवस्थाओं को भी सुचारू रूप से आगे बढ़ाना पड़ेगा। त्यागी वृत्ति धर्म की परंपरा को आगे बढ़ाती है, लेकिन त्यागी वृत्ति आएगी कहां से? जब परिवारों में सदस्य होंगे, संस्कार होंगे और धर्म का वातावरण होगा, तभी अगली पीढ़ी में त्याग और संयम की भावना विकसित होगी। परिवार ही नहीं रहेंगे, सदस्य ही नहीं होंगे तो त्यागी वृत्ति के लिए आवश्यक पीढ़ियां भी कहां से आएंगी। आज परिवारों के लगातार छोटे होते जाने और परिवार बढ़ाने की भावना कम होने पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।मुनि श्री ने युवाओं को अपनी पिछली पीढ़ियों को याद करने की बात कही। उन्होंने कहा कि पहले बड़े संयुक्त परिवार होते थे। सीमित साधनों के बावजूद माता-पिता और दादा-दादी ने बड़े परिवारों को संभाला, जिम्मेदारियां निभाईं और संस्कारों की परंपरा आगे बढ़ाई। आज साधन और सुविधाएं अधिक हैं, लेकिन जिम्मेदारी लेने की इच्छा कम होती जा रही है। पढ़ाई पूरी कर ली, नौकरी लग गई, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गए तो लगता है कि अब परिवार और गृहस्थी की जिम्मेदारी क्यों लें। यह सोच समाज और धर्म की परंपरा को नुकसान पहुंचाने के साथ स्वयं व्यक्ति के जीवन के लिए भी घातक है। हालांकि परिवार बढ़ाने का अर्थ केवल संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि परिवार के सदस्यों में धर्म और संस्कारों को बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।मुनि श्री ने जैन समाज से जनगणना में अपनी धार्मिक पहचान स्पष्ट रूप से दर्ज कराने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अनेक लोग अपने सरनेम को ही अपनी पहचान के रूप में लिखते हैं अलग-अलग सरनेम के कारण जैन समाज की वास्तविक संख्या का सही आकलन सामने नहीं आ पाता। इसलिए जनगणना के समय जाति और धर्म के कॉलम में ‘जैन’ पहचान स्पष्ट रूप से दर्ज करानी चाहिए। सरनेम जाति की जगह लिखा जा सकता है, लेकिन धर्म के कालम में जैन शब्द अवश्य लिखना चाहिए। इससे जैन समाज की वास्तविक संख्या सामने आएगी और देश में समाज की स्थिति का सही आकलन हो सकेगा।
उन्होंने कहा कि अपनी धार्मिक पहचान को स्पष्ट रूप से दर्ज कराना केवल संख्या का विषय नहीं, बल्कि धर्म और जिनशासन के प्रति जागरूकता का विषय है। समाज को अपनी पहचान को लेकर सजग और गौरवान्वित होना चाहिए। मनुष्य जीवन पिछले पुण्य का परिणाम है, लेकिन उसका सदुपयोग वर्तमान पुरुषार्थ से ही होगा। इसलिए परिवार, संस्कार, धर्म और आत्मकल्याण—इन सभी के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझकर आगे बढ़ना ही इस दुर्लभ मनुष्य पर्याय की सार्थकता है।
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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
मुनि श्री समतासागर जी