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41 वर्ष बाद गाडरवारा के मंच पर फिर जली नाट्य की लौ : (NSD कार्यशाला से शुरू हुई एक नई सांस्कृतिक यात्रा का सिंहावलोकन

Aditi News Team

Sat, Sep 12, 2026

41 वर्ष बाद गाडरवारा के मंच पर फिर जली नाट्य की लौ

(NSD कार्यशाला से शुरू हुई एक नई सांस्कृतिक यात्रा का सिंहावलोकन)

गाडरवारा की सांस्कृतिक स्मृतियों में वर्ष 1985 की रामलीला का अपना एक विशेष स्थान है। उसके बाद नगर में रंगमंच की वह निरंतरता कहीं थम-सी गई थी। समय बीतता रहा, पीढ़ियाँ बदलती रहीं, लेकिन मंचीय कला की वह उजास, वह सामूहिक सृजन और दर्शकों से कलाकारों का जीवंत संवाद गाडरवारा की सांस्कृतिक चेतना में कहीं भीतर दबा रहा।

इकतालीस वर्ष बाद 2026 में उस बुझी हुई लौ को फिर प्रज्वलित करने का प्रयास हुआ। राष्ट्रीय नाट्य संस्थान की एक माह की कार्यशाला ने केवल कुछ युवाओं को अभिनय का प्रशिक्षण नहीं दिया, बल्कि गाडरवारा को उसके रंगमंच से पुनः जोड़ने का ऐतिहासिक काम किया। इस पूरी पहल को मैं केवल एक कार्यशाला नहीं, बल्कि गाडरवारा के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की शुरुआत मानता हूँ।

इस स्वप्न के केंद्र में रहे हमारे अपने प्रियवर आशु भाई। उन्होंने गाडरवारा में नाट्य को फिर से जीवित करने का जो विचार रखा, उसके पीछे केवल एक कार्यक्रम कराने की आकांक्षा नहीं थी। उनकी दृष्टि कहीं अधिक व्यापक और दूरगामी थी। वे चाहते थे कि गाडरवारा में रंगमंच फिर से साँस ले, नई पीढ़ी मंच से जुड़े, प्रतिभाएँ अपने भीतर छिपे कलाकार को पहचानें और यह प्रयास किसी एक आयोजन तक सीमित न रहकर एक सांस्कृतिक परंपरा का रूप ले।

राष्ट्रीय नाट्य संस्थान की इस कार्यशाला ने उसी सोच को धरातल दिया। देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए प्रतिभागियों ने एक महीने तक गाडरवारा में रहकर अभिनय, रंगभाषा, संवाद, देहभाषा, मंचीय अनुशासन और सामूहिक सृजन की बारीकियों को समझा। एक कलाकार के निर्माण की प्रक्रिया केवल मंच पर दिखाई देने वाले प्रदर्शन से नहीं होती। उसके पीछे अनगिनत घंटे का अभ्यास, संवादों की पुनरावृत्ति, असफलताओं से सीखना, साथी कलाकारों के साथ सामंजस्य और अपने भीतर के संकोच को तोड़ना होता है। इस कार्यशाला में वह पूरी प्रक्रिया दिखाई दी।

इस यात्रा में पुनीत त्रिवेदी जी का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। एक माह तक प्रतिभागियों के साथ जिस समर्पण, धैर्य और श्रम से उन्होंने काम किया, वह अंतिम प्रस्तुति में स्पष्ट दिखाई दिया। किसी भी कार्यशाला की सफलता केवल उसके नाम या संस्थान से तय नहीं होती; उसे सफल बनाते हैं वे लोग जो प्रतिभागियों के साथ प्रतिदिन खड़े रहते हैं, उनकी कमियों को पहचानते हैं, उन्हें सुधारते हैं और उनके भीतर आत्मविश्वास जगाते हैं। *पुनीत भाई* ने यह भूमिका पूरी निष्ठा से निभाई।

कार्यशाला के संचालन में कुछ लोगों की सक्रियता, आत्मीयता और निरंतर सहभागिता ने इस पूरे आयोजन को गति और जीवंतता प्रदान की। उनके विचारों में भी यह स्पष्ट भाव दिखाई देता है कि रंगमंच केवल अभिनय सीखने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि मनुष्य को अपने समाज, अपनी संवेदनाओं और अपने जीवन से जोड़ने वाली सृजनात्मक साधना है। ऐसे लोगों की सक्रिय भागीदारी ही किसी सांस्कृतिक अभियान को आयोजन से आंदोलन की दिशा देती है।

विगत माह प्रियवर आशु भाई ने कार्यशाला के दौरान दो दिन प्रतिभागियों के साथ रहकर उन्हें केवल अभिनय के तकनीकी पक्ष से परिचित नहीं कराया, बल्कि रंगमंच के व्यापक अर्थ से भी जोड़ा। अभिनय किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन मंच पर जीना भर नहीं है; वह मनुष्य और जीवन को अधिक गहराई से समझने की प्रक्रिया भी है। यही वह दृष्टि है जो एक कलाकार को केवल अच्छा अभिनेता नहीं, बल्कि अधिक संवेदनशील मनुष्य बनाती है।

कल जब इस प्रस्तुति ने मंच पर आकार लिया होगा, तब निश्चय ही वह केवल एक नाटक नहीं रहा होगा। वह 1985 के बाद गाडरवारा के मंच पर लौटे उस आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति रहा होगा, जिसकी प्रतीक्षा शायद नगर को स्वयं भी नहीं थी। सभागार का खचाखच भर जाना, संवादों पर तालियाँ, हास्य के प्रसंगों पर गूँजते ठहाके और कलाकारों के अभिनय पर दर्शकों के चेहरों पर उभरता गर्व ये सभी संकेत हैं कि गाडरवारा ने रंगमंच को भुलाया नहीं था; वह केवल उसके लौटने की प्रतीक्षा कर रहा था।

इस आयोजन में नगरपालिका अध्यक्ष हमारे प्रिय राजू भाई का सहयोग भी विशेष रूप से स्मरणीय है। देश के विभिन्न हिस्सों से आए प्रतिभागियों के रहने और भोजन जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं को जिस आत्मीयता से उन्होंने संभाला, वह केवल प्रशासनिक सहयोग नहीं था। यह इस बात का प्रमाण था कि नगर अपने यहाँ आए कलाकारों और इस सांस्कृतिक पहल को अपना मान रहा है। किसी कला-आयोजन के लिए ऐसी आत्मीय सहभागिता स्वयं में एक बड़ी शक्ति होती है।

पंचलाइट का मंचन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि यह एक माह की कार्यशाला का समापन नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है। यदि एक महीने के प्रशिक्षण के बाद कलाकार मंच पर उतर सकते हैं, दर्शक उन्हें स्वीकार कर सकते हैं और पूरा नगर इस प्रयास को अपना सकता है, तो आगे की राह क्यों न बनाई जाए?

हमारे नगर में प्रतिभाओं की कमी कभी नहीं रही। आवश्यकता रही है उन्हें अवसर देने की, मंच देने की और निरंतर मार्गदर्शन देने की। प्रियवर आशु भाई की पहल ने उस आवश्यकता को पहचान लिया है। अब यह हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है कि इस लौ को बुझने न दें।

1985 की रामलीला से 2026 के ‘पंचलाइट’ तक की दूरी केवल 41 वर्षों की नहीं है; यह एक सांस्कृतिक विराम की दूरी है। *‘पंचलाइट’* ने उस विराम पर पूर्णविराम लगाने का साहस किया है।

कल मंच पर कलाकारों ने अपने पात्र निभाए होंगे, लेकिन वास्तव में उस मंच पर गाडरवारा ने अपनी सांस्कृतिक स्मृति का एक भूला हुआ अध्याय फिर से पढ़ा है।

नगरपालिका अध्यक्ष प्रिय राजू भाई के आत्मीय सहयोग के लिए आभार।और उन सभी कलाकारों को सलाम, जिन्होंने एक महीने की साधना को मंच की जीवंतता में बदल दिया।

अब आवश्यकता केवल इतनी है कि यह लौटना किसी एक शाम की घटना न बने, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की परंपरा बन जाए।और जब आने वाले वर्षों में कोई पूछेगा कि गाडरवारा के रंगमंच ने फिर से साँस कब ली थी, तो उत्तर होगा “2026 में, *‘पंचलाइट’* के साथ…

और उस पुनर्जागरण के पीछे था हमारे प्रियवर आशु भाई का वह सपना,जिसने अपने नगर की सांस्कृतिक धड़कन को फिर सुन लिया।”

इस कार्यक्रम के प्रत्येक सहयोगी को हार्दिक बधाई।

सुशील शर्मा

Tags :

अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)

आशुतोष राणा (अभिनेता)

NSD कार्यशाला गाडरवारा

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