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: मम्मी ट्रेन में बिलकुल भी भीड़ नही है, सीट मिल गई है आप चिंता मत करो,परीक्षा केंद्र पर पहुंच जाने पर फोन करेंगे,एक प्रतियोगी छात्र की कलम से

Aditi News Team

Mon, Oct 17, 2022
मम्मी ट्रेन में बिलकुल भी भीड़ नही है, सीट मिल गई है आप चिंता मत करो,परीक्षा केंद्र पर पहुंच जाने पर फोन करेंगे और फिर बेटा फोन काट देता है,चूंकि केंद्र ट्रेन में अधिक भीड़ होने के चलते फोन पर मां की आवाज सही से सुनाई नही दे रहा था,, अभी कल ही की बात है सुरेश ने पिता जी से पेपर देने जाने के लिए 1500 रुपए मांगे थे घर में पैसा ना होने के कारण पड़ोसी से पैसा मांगकर बेटे को परीक्षा देने जाने के लिए दिया।, रात को खाना खाते समय सुरेश के पिता जी बात कर रहे थे की बस एक बार किसी तरह से बेटे की नौकरी लग जाए तो हमारे भी दिन सुधर जायेगे सुरेश की अम्मा फिर सब कर्जा खत्म हो जाएगा,,सुरेश एक दिन कह रहा था नौकरी लगने के बाद अम्मा के लिए एक सुंदर सी साड़ी अपने पहले वेतन से लाकर दूंगा,बाबू जी आपके लिय एक सुंदर सा काटन का कुर्ता और एक जूता लाऊंगा,, यह हकीकत हर उस गरीब और मध्यम वर्गीय परिवार की है जिसका बेटा सरकारी नौकरी पाने के लिए घर से दूर किसी शहर में 10×8 के कमरे में एक टाइम दाल चावल तो दूसरे टाइम रोटी सब्जी या मैंगी खाकर परीक्षा की तैयारी करता है ,, मां - बाप के सपने उनके बुढ़ापे का सहारा बहन की शादी,घर का बढ़ता कर्ज ,छोटे भाई की पढ़ाई लोगो के ताने ,हमे आधी रात को सोने नहीं देती है छोटी उम्र में ही जिम्मेदारियां आंखो के नीचे घर बना लेती है,, हम आधे फार्म तो इसलिए नही भर पाते क्योंकि उस पर लगने वाला फीस हमारे कमरे के किराए के बराबर होता है,,एक फॉर्म डालो तो फॉर्म भरने से लेकर परीक्षा देने जाने तक का खर्च पूरे महीने के खर्च के बराबर हो जाता है,, ऊपर से एक दिन खबर आती है की उक्त परीक्षा के संबंध में STF ने बड़ा खुलासा किया पकड़े का गए सलावर परीक्षा हुई रद्द,और फिर सारे अरमानों पर पानी फिर जाता है,, पैसा भी जाता है ,समय भी जाता है,और सपने भी धरातल पकड़ लेते है,, ये देश के लिए दुर्भाग्य ही है जहां राजनीतिक रैलियों में बस और अन्य सवारी की गाड़ियां फ्री में चलाई जाती है लेकिन परीक्षा देने के लिए नही, दारू के ठेके खोलने के लिए सब्सिडी दी जाती है लेकिन परीक्षा के फीस में जरा भी कमी नहीं किया जाता है,धार्मिक,राजनीतिक व अन्य कार्यक्रमों में फ्री में खाने के समान बाटे जाते है लेकिन शिक्षा जगत में ऐसा कोई व्यवस्था नहीं है,, इतना सब कुछ होने के बावजूद भी अपने सपनो के लिए डटे रहने वाले प्रतियोगी छात्रों के जज्बे को सलाम,,  

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