"कुण्डलपुर संपूर्ण दिगम्बर जैन समाज की धरोहर, : आचार्य विद्यासागर जी की साधना ने दिलाई इसे विश्व में पहचान" : - निर्यापक मुनि श्री समतासागर
Aditi News Team
Wed, Oct 7, 2026
"कुण्डलपुर संपूर्ण दिगम्बर जैन समाज की धरोहर,
आचार्य विद्यासागर जी की साधना ने दिलाई इसे विश्व में पहचान" : - निर्यापक मुनि श्री समतासागर
कुण्डलपुर(म.प्र.)। कुण्डलपुर किसी एक व्यक्ति, संत या परंपरा की निजी धरोहर नहीं, बल्कि संपूर्ण दिगंबर जैन समाज और राष्ट्र की अमूल्य विरासत है। हजारों वर्ष पुरानी बड़े बाबा भगवान आदिनाथ की विशाल प्रतिमा, प्राचीन जिनालय और यहां साधना करने वाले संतों की परंपरा इस क्षेत्र की आध्यात्मिक गहराई को दर्शाती है। यह बात निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कही। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्या वाणी एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने प्रातःकाल बड़े बाबा मंदिर परिसर के सभा मंडप में श्रद्धालुओं को संबोधित किया।
मुनि श्री ने कहा कि कुण्डलपुर की भूमि पर यहां से निर्वाण को प्राप्त हुए अंतिम केवली श्रीधर स्वामी की साधना का प्रभाव रहा है। हजारों वर्ष पहले स्थापित बड़े बाबा की विशाल प्रतिमा की आध्यात्मिक ऊर्जा आज भी यहां अनुभव की जाती है। इसके साथ उन सभी मुनियों, आर्यिकाओं, आचार्यों, साधु-संतों और त्यागीव्रतियों की साधना भी जुड़ी है, जिन्होंने समय-समय पर इस क्षेत्र में आकर भक्ति और तप किया। इसलिए कुण्डलपुर को किसी एक व्यक्ति के नाम से सीमित करना उचित नहीं है।
उन्होंने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने भी कभी यह नहीं माना कि कुण्डलपुर उनका अपना क्षेत्र है। उनका जीवन तो स्वयं इस भावना का उदाहरण था कि जब शरीर तक अपना नहीं है तो किसी स्थान पर अधिकार की भावना कैसी। लेकिन श्रद्धालुओं की भावना में कुण्डलपुर की पहचान आचार्य श्री की साधना से गहराई से जुड़ गई है। उन्होंने इस क्षेत्र में लंबे समय तक तप-साधना की। चातुर्मास हुए, ग्रीष्म और शीतकालीन प्रवास हुए, स्वाध्याय कक्षाएं लगीं, विद्वानों की संगोष्ठियां हुईं, दीक्षाएं हुईं और अनेक धार्मिक अनुष्ठानों ने इस क्षेत्र की आध्यात्मिक चेतना को व्यापक बनाया।
मुनि श्री ने कहा कि आचार्य श्री ने बड़े बाबा के प्रति अपनी भक्ति को केवल पूजा तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अपने जीवन का समर्पण कर दिया। बड़े बाबा को भव्य सिंहासन पर विराजमान कराने से लेकर मंदिर की प्राचीनता और स्थापत्य परंपरा को सुरक्षित रखने तक उनके प्रयासों ने कुण्डलपुर को नई पहचान दी। उनकी तप-साधना और प्रभावना के कारण आज कुण्डलपुर का नाम बड़े बाबा और छोटे बाबा आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की साधना के साथ श्रद्धा से लिया जाता है।
उन्होंने कहा कि इस तीर्थ की सबसे बड़ी विशेषता इसका वातावरण है। पर्वतमाला में बने प्राचीन जिनालयों और मंदिरों की श्रृंखला को देखकर प्रत्येक दिगंबर जैन का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। इन मंदिरों का निर्माण किन परिस्थितियों में और किन साधकों ने कराया, यह भले ही पूरी तरह ज्ञात न हो, लेकिन यह हजारों वर्षों की धार्मिक चेतना और समाज के समर्पण का प्रमाण है।
मुनि श्री ने तीर्थयात्रा के अनुभव को जोड़ते हुए कहा कि लंबी यात्रा करके आने वाले श्रद्धालुओं के मन में थकान, असुविधाओं और व्यवस्थाओं को लेकर आकुलता-व्याकुलता रहती है। सुबह जल्दी उठकर जब वे वंदना के लिए निकलते हैं और सीढ़ियां चढ़कर बड़े बाबा के दरबार में पहुंचते हैं तो सारी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं। यात्रा कैसी रही, कमरे में क्या सुविधा मिली, क्या कमी रही, इन बातों का स्मरण तक नहीं रहता। बड़े बाबा की वंदना के साथ मन भक्ति में डूब जाता है।
उन्होंने कहा कि यह सच है कि कुण्डलपुर राजगृही नहीं है, न यहां भगवान महावीर का वही समवसरण है और न हम उस काल में उपस्थित थे। हमने भगवान महावीर का समवसरण देखा भी नहीं। लेकिन हमारी अनुभूति में यह स्थान उससे कम नहीं लगता। धर्मशाला से सीढ़ियां चढ़ते हुए जब श्रद्धालु बड़े बाबा के दरबार में पहुंचता है तो उसे ऐसा अनुभव होता है, जैसे विपुलाचल पर्वत पर भगवान महावीर का समवसरण लगा हो।
मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक जिनालय को समवसरण की अनुभूति के केंद्र के रूप में देखना चाहिए और प्रत्येक जिनबिंब को साक्षात अरहंत भगवान के स्वरूप में स्वीकार करना चाहिए। इसी भावना से की गई पूजा, भक्ति, पाठ और स्वाध्याय हमारे परिणामों को विशुद्ध करते हैं। इससे सम्यक दर्शन निर्मल और निर्दोष होता है तथा आत्मा मोक्षमार्ग की दिशा में आगे बढ़ती है।
उन्होंने कहा कि कुण्डलपुर में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए श्रद्धालु एक ही भाव में जुड़ जाते हैं। कर्नाटक, बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों से श्रावक-बंधु वंदना के लिए पहुंचे। घाटोल से समाज का प्रतिनिधिमंडल आया, वहीं गुजरात, राजस्थान कोटा और अन्य प्रांतों से भी श्रद्धालु पहुंचे। सभी अलग-अलग स्थानों से आए, लेकिन बड़े बाबा के दरबार में पहुंचकर एक हो गए। यही धर्म की प्रभावना और दिगंबरत्व तथा जैन शासन के प्रति समर्पण का भाव है। तीर्थ केवल मंदिरों का समूह नहीं, बल्कि वह स्थान है जहां बाहरी यात्रा समाप्त होकर आत्मयात्रा शुरू होती है।
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अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
निर्यापक मुनि श्री समतासागर जी