सम्यक ज्ञान से ही बदलेगी जीवन की दशा, : प्रगति के साथ विवेक और सावधानी जरूरी: मुनि श्री समतासागर महाराज
Aditi News Team
Wed, Oct 21, 2026
सम्यक ज्ञान से ही बदलेगी जीवन की दशा,
प्रगति के साथ विवेक और सावधानी जरूरी: मुनि श्री समतासागर महाराज
कुण्डलपुर। निर्यापक श्रमण मुनि श्री समतासागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में सम्यक ज्ञान की भावना जागृत होना बहुत जरूरी है। ज्ञान ही हमें अपने-पराए, सही-गलत और हित-अहित का बोध कराता है। संसार में धन, संपत्ति, परिवार, व्यापार और प्रतिष्ठा पुण्य के उदय से प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन आत्मा का यथार्थ ज्ञान और सम्यक दृष्टि प्राप्त करना दुर्लभ है। मनुष्य को बाहरी संसार का ज्ञान प्राप्त करने के साथ यह भी समझना चाहिए कि वह स्वयं कौन है और उसके जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है।
राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन ‘विद्यावाणी’ एवं प्रचारमंत्री जयकुमार जैन ‘जलज’ ने बताया कि मुनि श्री ने अपने प्रवचन में सम्यक ज्ञान, आत्मपहचान, विवेक और जीवन में सावधानी के महत्व को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने कहा कि डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक और किसान सहित प्रत्येक व्यक्ति को अपने कार्यक्षेत्र का ज्ञान होता है। विज्ञान ने भौतिक पदार्थों और प्रकृति के अनेक रहस्यों को उजागर किया है, लेकिन जैन दर्शन उस ज्ञान को महत्वपूर्ण मानता है, जो व्यक्ति को अपनी आत्मा और उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराए। संसार का ज्ञान जड़ पदार्थों तक सीमित रह सकता है, जबकि परमार्थ का ज्ञान ज्ञाता-द्रष्टा आत्मा की पहचान कराता है।
मुनि श्री ने कहा कि सम्यक ज्ञान का अर्थ केवल जानकारी प्राप्त करना नहीं, बल्कि सही और गलत के बीच अंतर समझना है। दूध और शराब का उदाहरण देते हुए उन्होंने समझाया कि यदि व्यक्ति को दोनों के गुण-दोष का ज्ञान नहीं है, तो वह बिना विवेक के किसी को भी ग्रहण कर सकता है। इसी प्रकार जीवन में उचित-अनुचित का बोध न होने पर मनुष्य गलत रास्ते पर बढ़ सकता है। धर्मग्रंथों के अध्ययन, तीर्थंकरों की देशना सुनने और गुरुजनों के सान्निध्य से सही दृष्टि प्राप्त होती है। भले ही व्यक्ति तत्काल अपनी बुराइयों को छोड़ न पाए, लेकिन सही और गलत का बोध हो जाने पर भविष्य में सुधार की संभावना बनती है।
जीवन में सावधानी का महत्व बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि सुनहरे कल की ओर बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन चमक-दमक देखकर भ्रमित नहीं होना चाहिए। सड़क पर लगे संकेत ‘सावधान, आगे अंधा मोड़ है’ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मोड़ अंधा नहीं होता, बल्कि कई बार आंखें होते हुए भी व्यक्ति विवेकहीन होकर आगे बढ़ता है। जल्दबाजी, नशे में वाहन चलाना और गलत तरीके से आगे निकलने की कोशिश दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं। आज का मनुष्य इतनी तेजी में है कि उसे न संकेत पढ़ने की फुर्सत है और न परिस्थितियों को समझने की। उसकी एक छोटी-सी लापरवाही स्वयं के साथ दूसरों के जीवन को भी संकट में डाल सकती है। इसलिए प्रगति के साथ संयम, विवेक और सावधानी आवश्यक हैं।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को विचार करना चाहिए कि वह कहां से आया है, कहां जा रहा है और वास्तव में कौन है। यदि इन प्रश्नों का उत्तर ही नहीं मालूम, तो जीवन की दिशा पर विचार करना जरूरी है। जैन दर्शन का सार आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना और अपने स्वभाव की ओर लौटना है। सिद्धांतों को केवल सुनना पर्याप्त नहीं, उन्हें जीवन में उतारना और उनका प्रचार-प्रसार करना भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि आत्मकल्याण की यात्रा प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं करनी पड़ती है। गुरु मार्ग दिखा सकते हैं, दिशा प्रदान कर सकते हैं, लेकिन आत्मा की पहचान और जीवन में परिवर्तन का प्रयास स्वयं करना होगा। सही दृष्टि और सम्यक ज्ञान से ही जीवन की दशा बदल सकती है। मनुष्य को दया, करुणा, अहिंसा और विवेक अपनाते हुए संसार के मार्ग और मोक्षमार्ग के अंतर को समझना चाहिए। यही आत्मकल्याण की दिशा में सार्थक कदम है।
Tags :
अदिति न्यूज,(सतीश लमानिया)
मुनि श्री समतासागर महाराज कुंडलपुर